भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय १०] यतियोंके लिये प्रायश्चित्तनिरूपण ४६७

भवेद्योगोऽप्रमत्तस्य योगो हि परमं बलम्।<br>न हि योगात्परं किञ्चिन्नराणां दृश्यते शुभम्॥ ४<br><br>तस्माद्योगं प्रशंसन्ति धर्मयुक्ता मनीषिणः।<br>अविद्यां विद्यया जित्वा प्राप्यैश्वर्यमनुत्तमम्॥ ५<br><br>दृष्ट्वा परावरं धीराः परं गच्छन्ति तत्पदम्।यह उपनिषद्का कथन है; प्रत्येक क्षणको योगमें प्रयुक्त करना चाहिये; क्योंकि आयु अत्यन्त चलायमान है। प्रमादरहितको ही योग प्राप्त होता है। योग महान् बल है; मनुष्योंके लिये योगसे बढ़कर कल्याणकारी कुछ भी नहीं दिखायी देता है। अतः धर्मयुक्त विद्वान् लोग योगकी प्रशंसा करते हैं। विद्याके द्वारा अविद्याको जीतकर अत्युत्तम ऐश्वर्य प्राप्त करके पुनः ब्रह्म तथा मायाविलासका भली-भाँति विचार करके धीर लोग [शिवनामक] उस परम पदको प्राप्त करते हैं॥ २—५ १/२॥
व्रतानि यानि भिक्षूणां तथैवोपाव्रतानि च॥ ६<br><br>एकैकातिक्रमे तेषां प्रायश्चित्तं विधीयते।<br>उपेत्य तु स्त्रियं कामात्प्रायश्चित्तं विनिर्द्दिशेत्॥ ७<br><br>प्राणायामसमायुक्तं चरेत्सान्तपनं व्रतम्।<br>ततश्चरति निर्देशात्कृच्छ्रं चान्ते समाहितः॥ ८<br><br>पुनराश्रममागत्य चरेद्भिक्षुरतन्द्रितः।यतियोंके लिये जो व्रत तथा उपव्रत हैं; उनमें प्रत्येकका अतिक्रम (उल्लंघन) होनेपर उनके लिये प्रायश्चित्तका विधान किया गया है। [गृहस्थको भी] कामनापूर्वक स्त्री-गमन करनेपर प्रायश्चित्त करना चाहिये; यतिको प्राणायामयुक्त सान्तपनव्रत करना चाहिये, इसके बाद एकाग्रचित्त होकर नियमानुसार कृच्छ्रव्रत करना चाहिये, तत्पश्चात् अपने आश्रममें लौटकर आलस्यरहित होकर भिक्षुक (यति)-को आचारपूर्वक रहना चाहिये॥ ६—८ १/२॥
न धर्मयुक्तमनृतं हिनस्तीति मनीषिणः॥ ९<br><br>तथापि न च कर्तव्यं प्रसङ्गो ह्येष दारुणः।<br>अहोरात्रोपवासश्च प्राणायामशतं तथा॥ १०<br><br>असद्वादो न कर्तव्यो यतिना धर्मलिप्सुना।<br>परमापद्गतेनापि न कार्यं स्तेयमप्युत॥ ११<br><br>स्तेयादभ्यधिकः कश्चिन्नास्त्यधर्म इति श्रुतिः।<br>हिंसा ह्येषा परा सृष्टा स्तैन्यं वै कथितं तथा॥ १२<br><br>यदेतद्द्रविणं नाम प्राणा ह्येते बहिश्चराः।<br>स तस्य हरते प्राणान् यो यस्य हरते धनम्॥ १३<br><br>एवं कृत्वा सुदुष्टात्मा भिन्नवृत्तो व्रताच्युतः।<br>भूयो निर्वेदमापन्नश्चरेच्चान्द्रायणं व्रतम्॥ १४<br><br>विधिना शास्त्रदृष्टेन संवत्सरमिति श्रुतिः।<br>ततः संवत्सरस्यान्ते भूयः प्रक्षीणकल्मषः।<br>पुनर्निर्वेदमापन्नश्चरेद्भिक्षुरतन्द्रितः ॥ १५धर्मार्थ असत्य [किसीको] दूषित नहीं करता है—ऐसा विद्वान् लोग कहते हैं; फिर भी उसे नहीं करना चाहिये। यह असत्य प्रसंग भयंकर होता है। [यदि यह हो जाता है, तो] एक दिन तथा एक रात उपवास और सौ प्राणायाम इसका प्रायश्चित्त है। धर्मके इच्छुक यतिको असद्वाद नहीं करना चाहिये; बड़ी-से-बड़ी विपत्ति पड़नेपर भी उसे चोरी नहीं करनी चाहिये; क्योंकि चोरीसे बढ़कर कोई अधर्म नहीं है—ऐसा श्रुति कहती है। चोरीको प्राणवधके समान होनेवाली हिंसाके रूपमें कहा गया है। जो यह धन है, वह मनुष्योंका बाहर विचरण करनेवाला प्राण ही है। जो जिसके धनका हरण करता है, वह मानो उसका प्राण ही हर लेता है। इस [चौर] कर्मको करके वह अत्यन्त दुष्ट मनवाला व्यक्ति आचाररहित तथा व्रतच्युत हो जाता है। उसे फिरसे वैराग्ययुक्त होकर शास्त्रोक्त विधिसे एक वर्षतक चान्द्रायणव्रत करना चाहिये—ऐसा श्रुति कहती है। वर्षके अन्तमें वह पापरहित हो जाता है; इसके बाद यतिको वैराग्ययुक्त होकर आलस्यरहित हो सदाचारका पालन करना चाहिये॥ ९—१५॥
अहिंसा सर्वभूतानां कर्मणा मनसा गिरा।<br>अकामादपि हिंसेत यदि भिक्षुः पशून् कृमीन्॥ १६सभी प्राणियोंके प्रति मन, वचन तथा कर्मसे अहिंसा भाव रखना चाहिये। यदि यति अनजानमें भी पशुओं तथा