श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ४६६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| द्वादश्यां धर्मतत्त्वज्ञं श्रौतस्मार्तप्रवर्तकम्।<br>त्रयोदश्यां जडां नारीं सर्वसङ्करकारिणीम्॥ ११६<br><br>जनयत्यङ्गना यस्मान्न गच्छेत्सर्वयत्नतः।<br>चतुर्दश्यां यदा गच्छेत्सा पुत्रजननी भवेत्॥ ११७<br><br>पञ्चदश्यां च धर्मिष्ठां षोडश्यां ज्ञानपारगम्।<br>स्त्रीणां वै मैथुने काले वामपार्श्वे प्रभञ्जनः॥ ११८<br><br>चरेद्यदि भवेन्नारी पुमांसं दक्षिणे लभेत्।<br>स्त्रीणां मैथुनकाले तु पापग्रहविवर्जिते॥ ११९<br><br>उक्तकाले शुचिर्भूत्वा शुद्धां गच्छेच्छुचिस्मिताम्।<br>इत्येवं सम्प्रसङ्गेन यतीनां धर्मसङ्ग्रहे॥ १२०<br><br>सर्वेषामेव भूतानां सदाचारः प्रकीर्तितः।<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि सदाचारं शुचिर्नरः॥ १२१<br><br>श्रावयेद्वा यथान्यायं ब्राह्मणान् दग्धकिल्बिषान्।<br>ब्रह्मलोकमनुप्राप्य ब्रह्मणा सह मोदते॥ १२२ | भाँति कन्या उत्पन्न करती है। बारहवें दिन स्त्री धर्मतत्त्वके ज्ञाता तथा श्रुति-स्मृतिके धर्मोंको चलानेवाले पुत्रको उत्पन्न करती है और तेरहवीं रातमें गमन करनेपर मूर्ख तथा वर्णसंकर [दोष] फैलानेवाली कन्या उत्पन्न करती है; अतः पूरे प्रयत्नसे उस दिन स्त्री-सहवास नहीं करना चाहिये। यदि चौदहवीं रातमें गमन किया जाय, तो वह स्त्री पुत्र उत्पन्न करनेवाली होती है। पन्द्रहवीं रातमें गमन करनेपर वह धर्मनिष्ठ कन्याको तथा सोलहवीं रातमें गमन करनेपर ज्ञानमें पारंगत पुत्रको उत्पन्न करती है॥ ११४-११७ १/२॥<br><br>मैथुनके समय यदि स्त्रियोंके बायें पार्श्वमें वायु प्रवाहित होता हो, तो कन्या होती है और दक्षिण पार्श्वमें प्रवाहित हो, तो पुत्र प्राप्त होता है। पापग्रहसे रहित मैथुन-कालमें स्त्रियोंसे सहवास करना चाहिये। ऐसे बताये गये [शुभ] समयमें पवित्र होकर उत्तम मुस्कानवाली भार्याके साथ गमन करना चाहिये॥ ११८-११९ १/२॥<br><br>[हे विप्रो!] इस प्रकार मैंने यतियोंके धर्मसंग्रहमें प्रसंगपूर्वक सभी प्राणियोंके सदाचारका वर्णन कर दिया। जो मनुष्य पवित्र होकर इस सदाचारको विधिपूर्वक पढ़ता है अथवा सुनता है अथवा दग्ध पापवाले ब्राह्मणोंको सुनाता है, वह ब्रह्मलोक प्राप्त करके ब्रह्माके साथ आनन्द करता है॥ १२०-१२२॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सदाचारकथनं नामैकोननवतितमोऽध्यायः॥ ८९॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'सदाचारकथन' नामक नवासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ८९॥
नब्बेवाँ अध्याय
यतियोंके लिये प्रायश्चित्तनिरूपण
| सूत उवाच | |
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| अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि यतीनामिह निश्चितम्।<br>प्रायश्चित्तं शिवप्रोक्तं यतीनां पापशोधनम्॥ १<br><br>पापं हि त्रिविधं ज्ञेयं वाङ्मनःकायसम्भवम्।<br>सततं हि दिवा रात्रौ येनेदं वेष्ट्यते जगत्॥ २<br><br>तत्कर्मणा विनाप्येष तिष्ठतीति परा श्रुतिः।<br>क्षणमेवं प्रयोज्यं तु आयुष्यं तु विधारणम्॥ ३ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] इसके बाद मैं यतियोंके लिये निश्चित किये गये प्रायश्चित्तका वर्णन करूँगा; शिवके द्वारा कहा गया यह [प्रायश्चित्त] यतियोंके पापका शोधन करनेवाला है॥ १॥<br><br>मन, वाणी तथा शरीरसे होनेवाले पापको तीन प्रकारका जानना चाहिये, जिसके द्वारा दिन-रात निरन्तर यह जगत् व्याप्त है। यति कर्मके बिना भी स्थित रहता है— |