भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय ८९] सदाचार तथा शौचाचारका निरूपण, द्रव्यशुद्धि, अशौचप्रवृत्ति एवं स्त्रीधर्मविवेचन ४६५

स्नानं शौचं तथा गानं रोदनं हसनं तथा।<br>यानमभ्यञ्जनं नारी द्यूतं चैवानुलेपनम् ॥ १०४<br><br>दिवास्वप्नं विशेषेण तथा वै दन्तधावनम्।<br>मैथुनं मानसं वापि वाचिकं देवतार्चनम् ॥ १०५<br><br>वर्जयेत्सर्वयत्नेन नमस्कारं रजस्वला।<br>रजस्वलाङ्गनास्पर्शसम्भाषे च रजस्वला ॥ १०६<br><br>सन्त्यागं चैव वस्त्राणां वर्जयेत्सर्वयत्नतः।<br>स्नात्वान्यपुरुषं नारी न स्पृशेत्तु रजस्वला ॥ १०७<br><br>ईक्षयेद्भास्करं देवं ब्रह्मकूर्चं ततः पिबेत्।<br>केवलं पञ्चगव्यं वा क्षीरं वा चात्मशुद्धये ॥ १०८रजस्वला स्त्रीको स्नान, शौच, गायन, रोदन, हास-परिहास, यात्रा करना, अभ्यंग, द्यूत, अनुलेपन, विशेष रूपसे दिनमें शयन, दन्तधावन, मैथुन, मन तथा वाणीसे भी देवपूजन, नमस्कार आदिको पूर्णप्रयत्नसे त्याग देना चाहिये। रजस्वलाको चाहिये कि अन्य रजस्वला स्त्रीके अंगस्पर्श तथा उसके साथ बातचीतका त्याग कर दे; उसे पूर्णप्रयत्नके साथ वस्त्र बदलनेका त्याग कर देना चाहिये। रजस्वला स्त्रीको चाहिये कि स्नान करके शुद्ध होनेपर [पतिके अतिरिक्त] अन्य पुरुषका स्पर्श न करे और सूर्यदेवका दर्शन करे। तदनन्तर आत्मशुद्धिके लिये ब्रह्मकूर्च अथवा केवल पंचगव्य अथवा दुग्धका पान करे॥ १०४-१०८॥
चतुर्थ्यां स्त्री न गम्या तु गतोऽल्पायुः प्रसूयते।<br>विद्याहीनं व्रतभ्रष्टं पतितं पारदारिकम् ॥ १०९<br><br>दारिद्र्यार्णवमग्नं च तनयं सा प्रसूयते।<br>कन्यार्थिनैव गन्तव्या पञ्चम्यां विधिवत्पुनः ॥ ११०<br><br>रक्ताधिक्याद्द्भवेन्नारी शुक्राधिक्ये भवेत्पुमान्।<br>समे नपुंसकं चैव पञ्चम्यां कन्यका भवेत् ॥ १११<br><br>षष्ठ्यां गम्या महाभागा सत्पुत्रजननी भवेत्।<br>पुत्रत्वं व्यञ्जयेत्तस्य जातपुत्रो महाद्युतिः ॥ ११२<br><br>पुमिति नरकस्याख्या दुःखं च नरकं विदुः।<br>पुंसस्त्राणान्वितं पुत्रं तथाभूतं प्रसूयते ॥ ११३रजोधर्मके चौथे दिन स्त्री गमनके योग्य नहीं होती है; वह स्त्री नष्ट तथा अल्प आयुवाले [पुत्र]-को जन्म देती है। वह विद्यारहित, व्रतसे च्युत, पतित, दूसरोंकी स्त्रियोंके साथ दुराचार करनेवाले तथा दरिद्रताके समुद्रमें डूबे रहनेवाले पुत्रको उत्पन्न करती है। पुत्रीकी कामना करनेवालेको पाँचवें दिन स्त्रीके साथ गमन करना चाहिये। रक्तका आधिक्य होनेपर कन्या होती है, शुक्रका आधिक्य होनेपर पुत्र होता है और दोनोंके समान होनेपर नपुंसक संतान उत्पन्न होती है। पाँचवें दिन सहवास करनेपर कन्या उत्पन्न होती है। छठें दिन यदि स्त्रीके साथ गमन किया जाय, तो वह महाभाग्यवती स्त्री उत्तम पुत्रको उत्पन्न करती है, उसके पुत्रत्वको प्रकट करती है और वह पैदा हुआ पुत्र महातेजस्वी होता है। ‘पुम्’—यह एक नरकका नाम है और नरकको दुःखपूर्ण कहा गया है; वह स्त्री पुम् [नरक]-से त्राण (रक्षा) करनेवाले उस प्रकारके पुत्रको जन्म देती है॥ १०९-११३॥
सप्तम्यां चैव कन्यार्थी गच्छेत्सैव प्रसूयते।<br>अष्टम्यां सर्वसम्पन्नं तनयं सम्प्रसूयते ॥ ११४<br><br>नवम्यां दारिकायार्थी दशम्यां पण्डितो भवेत्।<br>एकादश्यां तथा नारीं जनयेत्सैव पूर्ववत् ॥ ११५कन्याकी इच्छावालेको सातवीं रात्रिमें गमन करना चाहिये; किंतु वह कन्या वन्ध्या होती है। आठवीं रात्रिमें स्त्री सर्वगुणसम्पन्न पुत्रको जन्म देती है। कन्याकी इच्छावाले व्यक्तिको नौवीं रातमें सहवास करना चाहिये। दसवीं रातमें संभोग करनेपर विद्वान् पुत्र उत्पन्न होता है। ग्यारहवीं रातमें सहवास करनेपर वह स्त्री पूर्वकी