श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ४६४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| प्रकार मैंने संक्षेपमें अत्युत्तम द्रव्यशुद्धिका वर्णन कर दिया॥ ८८-९२॥ | |
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| अशौचं चानुपूर्व्येण यतीनां नैव विद्यते।<br>त्रेताप्रभृति नारीणां मासि मास्यार्तवं द्विजाः॥ ९३<br><br>कृते सकृद्युगवशाज्जायन्ते वै सहैव तु।<br>प्रयान्ति च महाभागा भार्याभिः कुरवो यथा॥ ९४ | पूर्वकी भाँति यतियोंका अशौच होता ही नहीं है। हे द्विजो! [अब मैं स्त्रियोंके रजोधर्मकी प्रवृत्तिका वर्णन करता हूँ] त्रेता आदि युगमें प्रत्येक मासमें स्त्रियोंको रजोधर्म होता है। युगकी प्रकृतिके अनुसार सत्ययुगमें लोग स्त्रियोंके साथ एक बार सहवास करते थे और सन्तानें उत्पन्न होती थीं, जिस प्रकार भाग्यशाली कुरुवर्षनिवासी करते थे॥ ९३-९४॥ |
| वर्णाश्रमव्यवस्था च त्रेताप्रभृति सुव्रताः।<br>भारते दक्षिणे वर्षे व्यवस्था नेतरेष्वथ॥ ९५<br><br>महावीते सुवीते च जम्बूद्वीपे तथाष्टसु।<br>शाकद्वीपादिषु प्रोक्तो धर्मो वै भारते यथा॥ ९६ | हे सुव्रतो! दक्षिणमें भारतवर्षमें वर्णाश्रम-व्यवस्था त्रेतायुगसे लेकर है; यह व्यवस्था अन्य आठ किंपुरुष आदि वर्षोंमें, महावीतमें तथा सुवीतमें नहीं है। शाकद्वीप आदि द्वीपोंमें भारतके ही समान धर्मकी व्यवस्था बतायी गयी है॥ ९५-९६॥ |
| रसोल्लासा कृते वृत्तिस्त्रेतायां गृहवृक्षजा।<br>सैवार्तवकृताद्दोषाद्रागद्वेषादिभिर्नृणाम् ॥ ९७<br><br>मैथुनात्कामतो विप्रास्तथैव परुषादिभिः।<br>यवाद्याः सम्प्रजायन्ते ग्राम्यारण्याश्चतुर्दश॥ ९८<br><br>ओषध्यश्च रजदोषाः स्त्रीणां रागादिभिर्नृणाम्।<br>अकालकृष्टा विध्वस्ताः पुनरुत्पादितास्तथा॥ ९९ | सत्ययुगमें लोगोंकी वृत्ति सहज आनन्दकी थी, त्रेतामें गृह, वृक्ष आदिपर आधारित वृत्ति थी। वही वृत्ति बादमें रजोदोषके कारण लोगोंके राग-द्वेषपर आधारित हो गयी। हे विप्रो! कामवश स्त्रीसंग, क्रोध इत्यादि दोषोंके कारण जौ आदि हविष्यान्न एवं औषधियाँ चौदह प्रकारके ग्राम्य तथा वन्य पदार्थोंके रूपमें उत्पन्न होने लगीं; जो अकालमें नष्ट होकर पुनः उत्पन्न होती थीं, इसलिये प्रयत्नपूर्वक रजस्वला स्त्रीसे सम्भाषण आदि नहीं करना चाहिये॥ ९७-९९ १/२॥ |
| तस्मात्सर्वप्रयत्नेन न सम्भाष्या रजस्वला।<br>प्रथमेऽहनि चाण्डाली यथा वर्ज्या तथाङ्गना॥ १००<br><br>द्वितीयेऽहनि विप्रा हि यथा वै ब्रह्मघातिनी।<br>तृतीयेऽह्नि तदर्धेन चतुर्थेऽहनि सुव्रताः॥ १०१<br><br>स्नात्वार्धमासात्संशुद्धा ततः शुद्धिर्भविष्यति।<br>आषोडशात्ततः स्त्रीणां मूत्रवच्छौचमिष्यते॥ १०२ | पहले दिन रजस्वला स्त्री चाण्डालीकी भाँति वर्ज्य होती है। हे विप्रो! दूसरे दिन वह ब्रह्मघातिनीके समान होती है और तीसरे दिन उसके आधे पापसे युक्त रहती है। हे सुव्रतो! चौथे दिन स्नान करके वह आधे महीनेतक देवपूजन आदिके लिये शुद्ध रहती है। पाँचवें दिनसे सोलहवें दिनतक रजोदोष रहनेके कारण स्त्रीस्पर्श आदिकी शुद्धि मूत्रोत्सर्गकी शुद्धिकी तरह कही गयी है। इसके बाद ही उसकी पूर्ण शुद्धि होगी॥ १००-१०२॥ |
| पञ्चरात्रं तथास्पृश्या रजसा वर्तते यदि।<br>सा विंशदिवसादूर्ध्वं रजसा पूर्ववत्तथा॥ १०३ | यदि स्त्री रजोदोषसे युक्त है, तो पाँच रात्रितक वह अस्पृश्य (अगम्य) होती है। बीस दिनके बाद भी वह यदि रजोदोषसे युक्त है, तो वह पूर्वकी भाँति अस्पृश्य होती है॥ १०३॥ |