भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय ८९] सदाचार तथा शौचाचारका निरूपण, द्रव्यशुद्धि, अशौचप्रवृत्ति एवं स्त्रीधर्मविवेचन ४६३


श्लोकअर्थ
स्नानमात्रेण वै शुद्धिर्मरणे समुपस्थिते।<br>तत ऋतुत्रयादर्वागेकाहः परगीयते॥ ८२है। जन्मके दस दिनके बाद छः मासके भीतर बालककी मृत्यु होनेपर एक दिनका अशौच होता है।
सप्तवर्षात्ततश्चार्वाक् त्रिरात्रं हि ततः परम्।<br>दशाहं ब्राह्मणानां वै प्रथमेऽहनि वा पितुः॥ ८३तत्पश्चात् सात वर्षसे छोटे बालककी मृत्यु होनेपर तीन रातका अशौच होता है। सात वर्षसे बड़े उपनीत ब्राह्मण-बालककी मृत्युपर दस दिनका अशौच होता है, किंतु विकल्पसे पिताके लिये एक दिनका भी अशौच बताया गया है,
दशाहं सूतिकाशौचं मातुरप्येवमव्ययाः।<br>अर्वाक् त्रिवर्षात्स्नानेन बान्धवानां पितुः सदा॥ ८४माताके लिये तो दस दिनका अशौच रहता ही है। तीन वर्षसे कमके बालककी मृत्युपर बान्धवोंकी शुद्धि स्नानमात्रसे हो जाती है, किंतु पिताकी शुद्धि सदा ही तीन रात्रिके उपरान्त ही होती है।
अष्टाब्दादेकरात्रेण शुद्धिः स्याद् बान्धवस्य तु।<br>द्वादशाब्दात्ततश्चार्वाक् त्रिरात्रं स्त्रीषु सुव्रताः॥ ८५आठ वर्षसे अधिकके सम्बन्धीकी मृत्यु होनेपर बान्धवोंकी शुद्धि एक दिनमें हो जाती है। हे सुव्रतो! आठ वर्षके बाद बारह वर्षके पहलेतक स्त्रियोंको तीन रातका अशौच होता है।
सपिण्डता च पुरुषे सप्तमे विनिवर्तते।<br>अतिक्रान्ते दशाहे तु त्रिरात्रमशुचिर्भवेत्॥ ८६सातवीं पीढ़ीके बाद सपिण्डता समाप्त हो जाती है। दस दिन बीत जानेपर अशौचका ज्ञान होनेपर तीन रातका अशौच होता है।
ततः सन्निहितो विप्रश्चार्वाक् पूर्वं तदेव वै।<br>संवत्सरे व्यतीते तु स्नानमात्रेण शुद्ध्यति॥ ८७हे विप्रो! छः मासके पहले मृत्युकी जानकारी होनेपर पक्षिणी (दो रात-एक दिन)-का अशौच होता है और उसके बाद एक वर्षसे पहले एक दिनका अशौच होता है। वर्ष व्यतीत हो जानेपर स्नानमात्रसे सपिण्डोंकी शुद्धि हो जाती है॥ ७७–८७॥
स्पृष्ट्वा प्रेतं त्रिरात्रेण धर्मार्थं स्नानमुच्यते।<br>दाहकानां च नेतॄणां स्नानमात्रमबान्धवे॥ ८८शवका स्पर्श कर लेनेपर तीन रातमें शुद्धि होती है। धर्मके लिये स्नान ही शुद्धिहेतु कहा जाता है। बान्धव न होनेपर शवका दाह करनेवाले तथा उसे ले जानेवालोंके लिये स्नानमात्र ही विहित है।
अनुगम्य च वै स्नात्वा घृतं प्राश्य विशुद्ध्यति।<br>आचार्यमरणे चैव त्रिरात्रं श्रोत्रिये मृते॥ ८९शवके साथ [यात्रामें] जानेपर स्नान करके तथा घृतका प्राशन करनेपर व्यक्ति शुद्ध होता है। हे द्विजो! आचार्य तथा श्रोत्रियके मरणमें तीन रातका अशौच होता है।
पक्षिणी मातुलानां च सोदराणां च वा द्विजाः।<br>भूपानां मण्डलीनां च सद्यो नीराष्ट्रवासिनाम्॥ ९०माताके भाइयोंके मरणमें पक्षिणी अशौच होता है और उपकारी जनोंके मरणमें तीन रातका अशौच होता है। राजाओं, सामन्तों तथा देशान्तरवासियोंके मरणमें स्नानमात्रसे शुद्धि हो जाती है।
केवलं द्वादशाहेन क्षत्रियाणां द्विजोत्तमाः।<br>नाभिषिक्तस्य चाशौचं सम्प्रमादेषु वै रणे॥ ९१हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! क्षत्रियोंका अशौच बारह दिनका होता है। अभिषिक्त राजाके रणमें मरनेपर बान्धवोंको अशौच नहीं होता है।
वैश्यः पञ्चदशाहेन शूद्रो मासेन शुद्ध्यति।<br>इति सङ्क्षेपतः प्रोक्ता द्रव्यशुद्धिरनुत्तमा॥ ९२वैश्य पन्द्रह दिनोंमें और शूद्र एक महीनेमें शुद्ध होता है। [हे विप्रो!] इस