भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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४६२ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग


श्लोकअर्थ
पण्यं प्रसारितं चैव वर्णाश्रमविभागशः।<br>शुचिराकरजं तेषां श्वा मृगग्रहणे शुचिः ॥ ७०खानसे निकालकर विक्रयहेतु फैलायी गयी वस्तुओंमें वर्णाश्रमविभागके अनुसार शुद्धता होती है और [मृगयामें] हरिण आदि पशुओंको पकड़ते समय श्वान शुद्ध होता है॥ ७० ॥
छाया च विप्लुषो विप्रा मक्षिकाद्या द्विजोत्तमाः।<br>रजोभूर्वायुरग्निश्च मेध्यानि स्पर्शने सदा ॥ ७१हे द्विजश्रेष्ठो! अनिषिद्ध छाया, वेदपाठके समय मुखसे निकली बूँदें, विप्र, मक्खियाँ, धूल, भूमि, वायु, अग्नि—ये सब स्पर्शके लिये सदा शुद्ध होते हैं। हे विप्रो! सोकर उठनेपर, भोजनके अनन्तर, छींक आनेपर, जल आदि पीनेपर, थूकनेपर और अध्ययनके आदिमें पवित्र होते हुए भी फिरसे आचमन करना चाहिये। अन्य लोगोंके द्वारा किये गये आचमनकी जो बूँदें पैरोंपर पड़ जायें, उन्हें धूलके समान समझना चाहिये; उनसे कोई अशुद्ध नहीं होता है॥ ७१—७३॥
सुप्त्वा भुक्त्वा च वै विप्राः क्षुत्त्वा पीत्वा च वै तथा।<br>ष्ठीवित्वाध्ययनादौ च शुचिरप्याचमेत्पुनः ॥ ७२
पादौ स्पृशन्ति ये चापि पराचमनबिन्दवः।<br>ते पार्थिवैः समा ज्ञेया न तैरप्रयतो भवेत् ॥ ७३
कृत्वा च मैथुनं स्पृष्ट्वा पतितं कुक्कुटादिकम्।<br>सूकरं चैव काकादि श्वानमुष्ट्रं खरं तथा ॥ ७४मैथुनके अनन्तर, पतितका स्पर्श करके, मुर्गा-सूअर-कौवा-कुत्ता-ऊँट-गधा-यूप, चाण्डाल आदिका स्पर्श करके व्यक्ति स्नानके द्वारा शुद्ध होता है। रजस्वला, प्रसूता तथा शूद्रा स्त्रीका स्पर्श नहीं करना चाहिये। जननाशौच तथा मरणाशौचसे युक्त व्यक्तिको चाहिये कि अपने सम्बन्धियोंकी स्त्रियोंमें रजस्वला स्त्रीको न छुए और छू लेनेपर वह स्नान करके ही शुद्ध होता है॥ ७४—७६॥
यूपं चाण्डालकाद्यांश्च स्पृष्ट्वा स्नानेन शुध्यति।<br>रजस्वलां सूतिकां च न स्पृशेदन्त्यजामपि ॥ ७५
सूतिकाशौचसंयुक्तः शावाशौचसमन्वितः।<br>संस्पृशेन रजस्तासां स्पृष्ट्वा स्नात्वैव शुध्यति ॥ ७६
नैवाशौचं यतीनां च वनस्थब्रह्मचारिणाम्।<br>नैष्ठिकानां नृपाणां च मण्डलीनां च सुव्रताः ॥ ७७हे सुव्रतो! संन्यासियों, वानप्रस्थियों, नैष्ठिक ब्रह्मचारियों, राजाओं तथा [उनके] मन्त्रियोंको अशौच नहीं लगता है। कार्यमें अवरोध न हो, इसलिये राजाओंको, भ्रमणशील संन्यासियों और ब्राह्मणोंको तथा पतितजनोंके लिये सम्भव न होनेके कारण अशौच नहीं होता है। कुछ भी संचय न करनेवाले ब्राह्मणों, यज्ञके लिये दीक्षित यजमान तथा जिन्हें अशौचकालमें उसकी जानकारी न हुई हो—ऐसे लोगोंकी स्नानमात्रसे शुद्धि हो जाती है।
ततः कार्यविरोधाद्धि नृपाणां नान्यथा भवेत्।<br>वैखानसानां विप्राणां पतितानामसम्भवात् ॥ ७८
असञ्चयद्विजानां च स्नानमात्रेण नान्यथा।<br>तथासन्निहितानां च यज्ञार्थं दीक्षितस्य च ॥ ७९
एकाहाद्यज्ञयाजीनां शुद्धिरुक्ता स्वयम्भुवा।<br>ततस्त्वधीतशाखानां चतुर्भिः सर्वदेहिनाम् ॥ ८०यज्ञमें दीक्षित ऋत्विजों तथा उनकी वैदिक शाखाका अध्ययन करनेवालोंका अशौच ब्रह्माजीने एक दिनका बताया है। अपने गोत्रसे भिन्न जनोंकी शुद्धि चार दिनोंमें हो जाती है; क्योंकि उनके लिये जननाशौच तथा मरणाशौच तीन दिनोंसे अधिक नहीं होता है।
सूतकं प्रेतकं नास्ति त्र्यहादूर्ध्वममुत्र वै।<br>अर्वागेकादशाहान्तं बान्धवानां द्विजोत्तमाः ॥ ८१[परिवारमें] मृत्यु हो जानेपर बान्धवोंकी दस दिनोंमें शुद्धि हो जाती