भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 463, कुल 834 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 463

अध्याय ८९] सदाचार तथा शौचाचारका निरूपण, द्रव्यशुद्धि, अशौचप्रवृत्ति एवं स्त्रीधर्मविवेचन ४६१

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
हैममद्भिः शुभं पात्रं रौप्यपात्रं द्विजोत्तमाः।<br>मण्‍यश्मशङ्खमुक्तानां शौचं तैजसवत्स्मृतम्॥ ५९<br><br>अग्नेरपां च संयोगादत्यन्तोपहतस्य च।<br>रसानामिह सर्वेषां शुद्धिरुत्प्लवनं स्मृतम्॥ ६०शुद्धि भस्मसे होती है, लौहपात्रकी शुद्धि क्षारसे, ताँबा-राँगा-सीसेके पात्रकी शुद्धि अम्लसे कही जाती है। हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! सोने तथा चाँदीके पवित्र पात्र जलसे शुद्ध होते हैं; मणि, पत्थर, शंख तथा मोतीकी शुद्धि भी सुवर्णपात्रकी भाँति कही गयी है। अत्यधिक दूषित पदार्थकी शुद्धि अग्नि तथा जलके संयोगसे होती है। सभी रसोंकी शुद्धि उत्प्लवन-क्रियाद्वारा बतायी गयी है॥ ५५-६०॥
तृणकाष्ठादिवस्तूनां शुभेनाभ्युक्षणं स्मृतम्।<br>उष्णेन वारिणा शुद्धिस्तथा स्रुक्स्रुवयोरपि॥ ६१<br><br>तथैव यज्ञपात्राणां मुशलोलूखलस्य च।<br>शृङ्गास्थिदारुदन्तानां तक्षणेनैव शोधनम्॥ ६२<br><br>संहतानां महाभागा द्रव्याणां प्रोक्षणं स्मृतम्।<br>असंहतानां द्रव्याणां प्रत्येकं शौचमुच्यते॥ ६३तृण, काष्ठ आदि वस्तुओंकी शुद्धिहेतु पवित्र जलसे अभ्युक्षण (छिड़काव) बताया गया है और स्रुक्-स्रुवाकी शुद्धि उष्ण जलसे होती है। उसी प्रकार यज्ञपात्रों, मूसल, उलूखल (ओखली), सींग-अस्थि-काष्ठ तथा हाथीदाँतकी बनी वस्तुओंकी शुद्धि तक्षण (छीलने)-से होती है। हे महाभागो! संहत (मिली-जुली) वस्तुओंकी शुद्धिहेतु प्रोक्षण बताया गया है और असंहत (पृथक्) वस्तुओंको अलग-अलग शुद्ध करना बताया गया है॥ ६१-६३॥
अभुक्तराशिधान्यानामेकदेशस्य दूषणे।<br>तावन्मात्रं समुद्धृत्य प्रोक्षयेद्वै कुशाम्भसा॥ ६४<br><br>शाकमूलफलादीनां धान्यवच्छुद्धिरिष्यते।<br>मार्जनोन्मार्जनैर्वेश्म पुनःपाकेन मृन्मयम्॥ ६५<br><br>उल्लेखनेनाञ्जनेन तथा सम्मार्जनेन च।<br>गोनिवासेन वै शुद्धा सेचनेन धरा स्मृता॥ ६६<br><br>भूमिस्थमुदकं शुद्धं वैतृष्ण्यं यत्र गौर्व्रजेत्।<br>अव्याप्तं यदमेध्येन गन्धवर्णरसान्वितम्॥ ६७<br><br>वत्सः शुचिः प्रस्त्रवणे शकुनिः फलपातने।<br>स्वदारास्यं गृहस्थानां रतौ भार्याभिकाङ्क्षया॥ ६८<br><br>हस्ताभ्यां क्षालितं वस्त्रं कारुणा च यथाविधि।<br>कुशाम्बुना सुसम्प्रोक्ष्य गृह्णीयाद्धर्मवित्तमः॥ ६९भोजनहेतु अनाजकी राशिके एक भागके दूषित हो जानेपर उतने भागको निकालकर शेष भागका कुशके जलसे प्रोक्षण करना चाहिये। शाक, मूल, फल आदिकी शुद्धि धान्य (अनाज)-की शुद्धिकी भाँति कही जाती है। घरकी शुद्धि मार्जन (जलसेचन) तथा गोबरसे लीपनेसे होती है। मिट्टीका पात्र अग्निमें गर्म करनेसे शुद्ध होता है। भूमिकी शुद्धि खनन (खोदने)-से, गायके गोबरसे लीपनेसे, मलापकरणसे, गायके निवाससे तथा जलके द्वारा सेचनसे बतायी गयी है। भूमिपर ठहरा हुआ जल जो अपवित्र पदार्थसे युक्त न हो तथा गन्ध, वर्ण, रससे युक्त हो, वह गायके द्वारा प्यास बुझनेतक पी लिये जानेपर शुद्ध हो जाता है। बछड़ा गोदोहनके समय शुद्ध होता है और पक्षी [चोंचद्वारा] फल गिरानेके समय शुद्ध होता है। भार्याकी आकांक्षासे रतिके समय गृहस्थोंके लिये पत्नी शुद्ध होती है। धर्मवेत्ताको चाहिये कि धोबीके द्वारा हाथसे धोये गये वस्त्रको विधिपूर्वक कुशके जलसे प्रोक्षित करके धारण करे॥ ६४-६९॥
श्रीलिंगमहापुराण · पृष्ठ 463, कुल 834 में से · BharatKosha