भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४६०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| यः पुनस्तत्त्ववेत्ता च ब्रह्मविद् ब्राह्मणोत्तमः ।<br>स्मरणाच्छुद्धिमवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥ ४७<br><br>नैवमात्मविदामस्ति प्रायश्चित्तानि चोदना ।<br>विश्वस्यैव हि ते शुद्धा ब्रह्मविद्याविदो जनाः ॥ ४८<br><br>योगध्यानैकनिष्ठाश्च निर्लेपाः काञ्चनं यथा ।<br>शुद्धानां शोधनं नास्ति विशुद्धा ब्रह्मविद्यया ॥ ४९<br><br>उद्धृतानुष्णफेनाभिः पूताभिर्वस्त्रचक्षुषा ।<br>अद्भिः समाचरेत्सर्वं वर्जयेत्कलुषोदकम् ॥ ५०<br><br>गन्धवर्णरसैर्दुष्टमशुचिस्थानसंस्थितम् ।<br>पङ्काश्मदूषितं चैव सामुद्रं पल्वलोदकम् ॥ ५१<br><br>सशैवालं तथान्यैर्वा दोषैर्दुष्टं विवर्जयेत् ।<br>वस्त्रशौचान्वितः कुर्यात्सर्वकार्याणि वै द्विजाः ॥ ५२<br><br>नमस्कारादिकं सर्वं गुरुशुश्रूषणादिकम् ।<br>वस्त्रशौचविहीनात्मा ह्यशुचिर्नात्र संशयः ॥ ५३<br><br>देवकार्योपयुक्तानां प्रत्यहं शौचमिष्यते ।<br>इतरेषां हि वस्त्राणां शौचं कार्यं मलागमे ॥ ५४<br><br>वर्जयेत्सर्वयत्नेन वासोऽन्यैर्विधृतं द्विजाः ।<br>कौशेयाविकयो रूक्षैः क्षौमाणां गौरसर्षपैः ॥ ५५<br><br>श्रीफलैरंशुप्ट्टानां कुतपानामरिष्टकैः ।<br>चर्मणां विदलानां च वेत्राणां वस्त्रवन्मतम् ॥ ५६<br><br>वल्कलानां तु सर्वेषां छत्रचामरयोरपि ।<br>चैलवच्छौचमाख्यातं ब्रह्मविद्भिर्मुनीश्वरैः ॥ ५७<br><br>भस्मना शुद्ध्यते कांस्यं क्षारेणायसमुच्यते ।<br>ताम्रमम्लेन वै विप्रास्त्रपुसीसकयोरपि ॥ ५८ | एक सौ आठ बार जप करनेसे [पापसे] मुक्ति हो जाती है; इसमें सन्देह नहीं है। जो तत्त्वज्ञानी, ब्रह्मवेत्ता तथा उत्तम ब्राह्मण है, वह तो केवल [प्रणवके] स्मरणसे शुद्धि प्राप्त कर लेता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ ४६-४७ ॥<br><br>आत्मज्ञानियोंके लिये प्रायश्चित्त होते ही नहीं हैं; ब्रह्मविद्याको जाननेवाले लोग विश्वके कल्याणके प्रेरक होते हैं, अतः वे [स्वतः] शुद्ध हैं। योगध्यानमें एकनिष्ठ वे लोग निर्लेप (शुद्ध) होते हैं, जैसे सुवर्ण शुद्ध होता है। शुद्ध लोगोंका शोधन नहीं होता है; वे तो ब्रह्मविद्याके द्वारा [पहले ही] शुद्ध होते हैं ॥ ४८-४९ ॥<br><br>नदी आदिसे ग्रहण किये गये, वस्त्र तथा नेत्रसे [भलीभाँति] पवित्र, शीतल तथा फेनरहित जलसे सभी अनुष्ठान करना चाहिये; अशुद्ध जलका प्रयोग नहीं करना चाहिये। गन्ध-रंग-रससे दूषित जल, अपवित्र स्थानमें रखे हुए जल, कीचड़ तथा कंकड़से दूषित जल, समुद्री जल, तालाबके जल, शैवालयुक्त जल और अन्य दोषोंसे विकृत जलका सर्वथा त्याग कर देना चाहिये ॥ ५०-५१ १/२ ॥<br><br>हे द्विजो! वस्त्रकी शुद्धिसे युक्त होकर नमस्कार आदि तथा गुरुसेवा आदि समस्त कार्य करने चाहिये; वस्त्रशुद्धिसे रहित व्यक्ति निश्चित रूपसे अपवित्र रहता है; इसमें सन्देह नहीं है। देवकार्यमें उपयोग किये जानेवाले वस्त्रोंकी शुद्धि प्रतिदिन आवश्यक है; मैले हो जानेपर अन्य वस्त्रोंकी शुद्धि करनी चाहिये। हे द्विजो! दूसरोंके द्वारा धारण किये गये वस्त्रका पूर्ण प्रयत्नसे त्याग करना चाहिये ॥ ५२-५४ १/२ ॥<br><br>रेशमी तथा ऊनी वस्त्रोंकी शुद्धि [रीठे आदि] रूक्ष पदार्थोंसे, क्षौम (दुकूल) वस्त्रोंकी शुद्धि श्वेत सरसोंसे, स्वर्णकिरणयुक्त वस्त्रोंकी शुद्धि बिल्व फलोंसे, कुशास्तरणों या छाग-कम्बलोंकी शुद्धि मट्ठेके सेचनसे और चमड़े-शणवस्त्रों-बेंतसे बनी वस्तुओंकी शुद्धि सामान्य वस्त्रोंकी भाँति कही गयी है। ब्रह्मवेत्ता मुनीश्वरोंने समस्त वल्कल वस्त्रोंकी तथा छत्र-चामरकी शुद्धि वस्त्रशुद्धिकी भाँति बतायी है। हे विप्रो! कांस्यपात्रकी |