श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
पृष्ठ 461, कुल 834 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 461
अध्याय ८९ ] सदाचार तथा शौचाचारका निरूपण, द्रव्यशुद्धि, अशौचप्रवृत्ति एवं स्त्रीधर्मविवेचन ४५९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ज्येष्ठान्येऽपि च ते सर्वे वन्दनीया विजानता।<br>आज्ञाभङ्गं न कुर्वीत यदीच्छेत्सिद्धिमुत्तमाम्॥ ३५ | आठों अंगोंको पृथ्वीसे स्पर्श करके तीन बार ब्राह्मण गुरुको प्रणाम करना चाहिये। बुद्धिमन्को चाहिये कि जो अन्य ज्येष्ठ लोग हैं, उन सबको प्रणाम करे। यदि कोई उत्तम सिद्धिकी कामना करता है, तो उनकी आज्ञाका उल्लंघन न करे॥ ३३—३५॥ |
| धातुशून्यबिलक्षेत्रक्षुद्रमन्त्रोपजीवनम् ।<br>विषग्रहविडम्बादीन् वर्जयेत्सर्वयत्नतः॥ ३६<br><br>कैतवं वित्तशाठ्यं च पैशुन्यं वर्जयेत्सदा।<br>अतिहासमवष्टम्भं लीलास्वेच्छाप्रवर्तनम्॥ ३७<br><br>वर्जयेत्सर्वयत्नेन गुरूणामपि सन्निधौ।<br>तद्वाक्यप्रतिकूलं च अयुक्तं वै गुरोर्वचः॥ ३८<br><br>न वदेत्सर्वयत्नेन अनिष्टं न स्मरेत्सदा। | धातुवाद, नास्तिकवाद, ऊसर स्थानमें निवास, क्षुद्र-मन्त्रोंका उपयोग, सर्पोंको पकड़ना आदि निन्दनीय कार्योंका पूर्ण प्रयत्नसे परित्याग करना चाहिये। धूर्तता, धनकी कृपणता तथा पिशुनता (परनिन्दा)-का सदा त्याग करना चाहिये। गुरुजनोंके सान्निध्यमें अत्यधिक हँसना, अशिष्टता तथा मनमाना कार्य करना—इन सबका पूर्ण प्रयत्नसे परित्याग करना चाहिये। गुरुकी आज्ञाके प्रतिकूल आचरण नहीं करना चाहिये और पूर्ण प्रयत्नपूर्वक कभी भी उनका अनिष्ट (बुरा) नहीं सोचना चाहिये॥ ३६—३८ १/२॥ |
| यतीनामासनं वस्त्रं दण्डाद्यं पादुके तथा॥ ३९<br><br>माल्यं च शयनस्थानं पात्रं छायां च यत्नतः।<br>यज्ञोपकरणाङ्गं च न स्पृशेद्वै पदेन च॥ ४०<br><br>देवद्रोहं गुरुद्रोहं न कुर्यात्सर्वयत्नतः।<br>कृत्वा प्रमादतो विप्राः प्रणवस्यायुतं जपेत्॥ ४१<br><br>देवद्रोहेगुरुद्रोहात्कोटिमात्रेण शुध्यति।<br>महापातकशुद्ध्यर्थं तथैव च यथाविधि॥ ४२<br><br>पातकी च तदर्धेन शुध्यते वृत्तवान् यदि।<br>उपपातकिनः सर्वे तदर्धेनैव सुव्रताः॥ ४३ | यतियों (संन्यासियों)-के आसन, वस्त्र, दण्ड, खड़ाऊँ, माला, शयनस्थान, पात्र, छाया तथा यज्ञके उपकरणोंको पैरसे कभी नहीं छूना चाहिये। हे विप्रो! देवताओं तथा गुरुजनोंसे द्रोह न हो, इसका पूर्ण प्रयास करना चाहिये; प्रमादवश द्रोह कर लेनेपर प्रणवका दस हजार जप करना चाहिये। [जानबूझकर] गुरुद्रोह तथा देवद्रोह करनेपर एक करोड़ जपके द्वारा [व्यक्ति] शुद्ध होता है। महापातकोंसे शुद्धिके लिये भी वही विधि है, जो इसके लिये है। पातकी यदि चरित्रवान् है, तो वह उसके आधे जपसे शुद्ध हो जाता है। हे सुव्रतो! सभी उपपातकी उसके भी आधे जपसे शुद्ध हो जाते हैं॥ ३९—४३॥ |
| सन्ध्यालोपे कृते विप्रः त्रिरावृत्त्यैव शुद्ध्यति।<br>आह्निकच्छेदने जाते शतमेकमुदाहृतम्॥ ४४ | सन्ध्यावन्दनका लोप करनेपर विप्र इसकी तीन आवृत्ति करके शुद्ध हो जाता है और दैनिक कृत्यका उल्लंघन होनेपर एक सौ बार जप करना बताया गया है॥ ४४॥ |
| लङ्घने समयानां तु अभक्ष्यस्य च भक्षणे।<br>अवाच्यवाचने चैव सहस्राच्छुद्धिरुच्यते॥ ४५ | [नियत] समयका उल्लंघन करनेपर, अभक्ष्य [पदार्थ]-का भक्षण करनेपर और न बोलनेयोग्य वचन बोलनेपर एक हजार जपसे शुद्धि कही जाती है॥ ४५॥ |
| काकोलूककपोतानां पक्षिणामपि घातने।<br>शतमष्टोत्तरं जप्त्वा मुच्यते नात्र संशयः॥ ४६ | कौआ, उल्लू तथा कबूतर पक्षियोंका वध करनेपर |