भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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४५८ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अस्तेयं ब्रह्मचर्यं च अलोभस्त्याग एव च।<br>व्रतानि पञ्च भिक्षूणामहिंसा परमा त्विह॥ २४<br><br>अक्रोधो गुरुशुश्रूषा शौचमाहारलाघवम्।<br>नित्यं स्वाध्याय इत्येते नियमाः परिकीर्तिताः॥ २५अथवा चार बार करना चाहिये। भिक्षुओंके लिये ये पाँच व्रत हैं—अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य, अलोभ, त्याग और परम अहिंसा। क्रोध न करना, गुरुकी सेवा, शुद्धता, आहारकी अल्पता और प्रतिदिन स्वाध्याय—ये नियम बताये गये हैं॥ २३–२५॥
बीजयोनिगुणा वस्तुबन्धः कर्मभिरेव च।<br>यथा द्विप इवारण्ये मनुष्याणां विधीयते॥ २६माता-पितासे प्राप्त संस्कार, अपने स्वभाव, धन आदि तथा संचितकर्म—इन सबसे देवताओंके द्वारा मनुष्य वनमें दुर्ग्रह हाथीकी भाँति बन्धनग्रस्त हो जाता है॥ २६॥
देवैस्तुल्याः सर्वयज्ञक्रियास्तु<br>यज्ञाज्जाप्यं ज्ञानमाहुश्च जाप्यात।<br>ज्ञानाद्ध्यानं सङ्गरागादपेतं<br>तस्मिन् प्राप्ते शाश्वतस्योपलम्भः॥ २७सभी यज्ञ-क्रियाएँ देवतुल्य (स्वर्ग प्राप्त करानेवाली) हैं। यज्ञसे श्रेष्ठ जपको तथा जपसे श्रेष्ठ ज्ञानको बताया गया है; किंतु आसक्ति तथा रागसे रहित ध्यान ज्ञानसे भी श्रेष्ठ है; उसके प्राप्त हो जानेसे शाश्वत पदकी प्राप्ति हो जाती है॥ २७॥
दमः शमः सत्यमकल्मषत्वं<br>मौनं च भूतेष्वखिलेषु चार्जवम्।<br>अतीन्द्रियं ज्ञानमिदं तथा शिवं<br>प्राहुस्तथा ज्ञानविशुद्धबुद्धयः॥ २८ज्ञानसे विशुद्ध बुद्धिवाले लोगोंने इन्द्रियोंके दमन, मनपर नियन्त्रण, सत्य, पापहीनता, मौन, समस्त प्राणियोंके प्रति सरलता और अतीन्द्रिय ज्ञानको शिवस्वरूप बताया है॥ २८॥
समाहितो ब्रह्मपरोऽप्रमादी<br>शुचिस्तथैकान्तरतिर्जितेन्द्रियः।<br>समाप्नुयाद्योगमिमं महात्मा<br>महर्षयश्चैवमनिन्दितामलाः॥ २९एकाग्रचित्तवाला, ब्रह्मपरायण, प्रमादरहित, शुद्ध, एकान्तका सेवन करनेवाला तथा जितेन्द्रिय महात्मा ही इस [पाशुपत] योगको प्राप्त कर सकता है—ऐसा निष्कलंक तथा निष्पाप महर्षिगण कहते हैं॥ २९॥
प्राप्यतेऽभिमतान् देशानङ्कुशेन निवारितः।<br>एतन्मार्गेण शुद्धेन दग्धबीजो ह्यकल्मषः॥ ३०इस शुद्ध योगमार्गरूपी अंकुशसे नियन्त्रित व्यक्ति दग्धबीजवाला तथा पापरहित होकर अभीष्ट फलोंको प्राप्त करता है॥ ३०॥
सदाचाररताः शान्ताः स्वधर्मपरिपालकाः।<br>सर्वान् लोकान् विनिर्जित्य ब्रह्मलोकं व्रजन्ति ते॥ ३१जो सदाचारपरायण, शान्त (अन्तःकरणकी वृत्तियोंको निगृहीत कर लेनेवाले) तथा अपने धर्मका पालन करनेवाले हैं, वे सभी लोकोंको जीतकर ब्रह्मलोक चले जाते हैं॥ ३१॥
पितामहेनोपदिष्टो धर्मः साक्षात्सनातनः।<br>सर्वलोकोपकारार्थं शृणुध्वं प्रवदामि वः॥ ३२साक्षात् पितामहने सभी लोकोंके उपकारके लिये सनातनधर्मका उपदेश किया था; मैं आपलोगोंको बता रहा हूँ, उसे सुनिये॥ ३२॥
गुरूपदेशयुक्तानां वृद्धानां क्रमवर्तिनाम्।<br>अभ्युत्थानादिकं सर्वं प्रणामं चैव कारयेत्॥ ३३गुरुके उपदेशसे युक्त तथा नियमोंका पालन करनेवाले वृद्धजनोंका स्वागत आदि तथा प्रणाम—यह सब करना चाहिये। हे सुव्रतो! तीन बार प्रदक्षिणा करके
अष्टाङ्गप्रणिपातेन त्रिधा न्यस्तेन सुव्रताः।<br>त्रिःप्रदक्षिणयोगेन वन्द्यो वै ब्राह्मणो गुरुः॥ ३४