भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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४८४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| योजनं विद्धि चार्वङ्गि मृत्युकालेऽमृतप्रदम्।<br>महालयगिरिस्थं मां केदारे च व्यवस्थितम्॥ १००<br><br>गणत्वं लभते दृष्ट्वा ह्यस्मिन् मोक्षो ह्यवाप्यते।<br>गाणपत्यं लभेदस्माद्यतः सा मुक्तिरुत्तमा॥ १०१<br><br>ततो महालयात्तस्मात्केदारान्मध्यमादपि।<br>स्मृतं पुण्यतमं क्षेत्रमविमुक्तं वरानने॥ १०२<br><br>केदारं मध्यमं क्षेत्रं स्थानं चैव महालयम्।<br>मम पुण्यानि भूलोके तेभ्यः श्रेष्ठतमं त्विदम्॥ १०३ | यह क्षेत्र चारों दिशाओंमें चार कोस अतएव एक योजनमें कहा गया है; हे सुन्दर अंगोंवाली! मृत्युकालमें इसे अमरता प्रदान करनेवाला जानो। महालय गिरिमें विराजमान और केदारपर स्थित मेरा दर्शन करके मनुष्य गणत्व प्राप्त करता है, किंतु इस क्षेत्रमें मोक्षकी प्राप्ति होती है। उन स्थानोंमें गणपति पद प्राप्त होता है और यहाँपर उत्तम मुक्ति प्राप्त होती है, अतः हे वरानने! उस महालय, केदार तथा मध्यम क्षेत्र—इन सबसे पुण्यप्रद यह अविमुक्त क्षेत्र कहा गया है। केदार, मध्यमक्षेत्र तथा महालय स्थान—ये तीनों पृथ्वीलोकमें मेरे पवित्र क्षेत्र हैं, किंतु यह [अविमुक्तक्षेत्र] उनसे भी अधिक श्रेष्ठ है॥ ९९–१०३॥ | | यतः सृष्टास्त्विमे लोकास्ततः क्षेत्रमिदं शुभम्।<br>कदाचिन्न मया मुक्तमविमुक्तं ततोऽभवत्॥ १०४<br><br>अविमुक्तेश्वरं लिङ्गं मम दृष्ट्वेह मानवः।<br>सद्यः पापविनिर्मुक्तः पशुपाशैर्विमुच्यते॥ १०५<br><br>शैलेशं सङ्गमेशं च स्वर्लीनं मध्यमेश्वरम्।<br>हिरण्यगर्भमीशानं गोप्रेक्षं वृषभध्वजम्॥ १०६<br><br>उपशान्तं शिवं चैव ज्येष्ठस्थाननिवासिनम्।<br>शुक्रेस्वरं च विख्यातं व्याघ्रेशं जम्बुकेश्वरम्॥ १०७<br><br>दृष्ट्वा न जायते मर्त्यः संसारे दुःखसागरे। | जबसे इन लोकोंकी सृष्टि की गयी है, तबसे मैंने इस पवित्र क्षेत्रका परित्याग कभी नहीं किया, इसलिये यह अविमुक्त [क्षेत्र] हो गया। यहाँ मेरे अविमुक्तेश्वर लिङ्गका दर्शन करके मनुष्य शीघ्र ही पापोंसे मुक्त होकर पशुपाशों (जीवबन्धन)—से छूट जाता है। शैलेश्वर, संगमेश्वर, स्वर्लीनेश्वर, मध्यमेश्वर, हिरण्यगर्भ, ईशान, गोप्रेक्ष, वृषभध्वज, उपशान्त, ज्येष्ठस्थानमें निवास करनेवाले शिव, शुक्लेश्वर, प्रसिद्ध व्याघ्रेश्वर तथा जम्बुकेश्वरका दर्शन करके मनुष्य दुःखके सागररूप संसारमें [पुनः] जन्म नहीं लेता है॥ १०४–१०७ १/२॥ | | सूत उवाच<br>एवमुक्त्वा महादेवे दिशः सर्वा व्यलोकयत्॥ १०८<br><br>विलोक्य संस्थिते पश्चाद्देवदेवे महेश्वरे।<br>अकस्मादभवत्सर्वः स देशोज्ज्वलितो यथा॥ १०९<br><br>ततः पाशुपताः सिद्धा भस्माभ्यङ्गसितप्रभाः।<br>माहेश्वरा महात्मानस्तथा वै नियतव्रताः॥ ११०<br><br>बहवः शतशोऽभ्येत्य नमश्चक्रुर्महेश्वरम्।<br>पुनर्निरीक्ष्य योगेशं ध्यानयोगं च कृत्स्नशः॥ १११<br><br>तस्थुरात्मानमास्थाय लीयमाना इवेश्वरे।<br>स्थितानां स तदा तेषां देवदेव उमापतिः॥ ११२<br><br>स बिभ्रत्परमां मूर्तिं बभूव पुरुषः प्रभुः।<br>कृत्स्नं जगदिहैकस्थं कर्तुमन्त इव स्थितः॥ ११३ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] ऐसा कहकर महादेवने सभी दिशाओंकी ओर देखा। [दिशाओंकी ओर] देखकर देवदेव महेश्वरके बैठ जानेके अनन्तर वह सम्पूर्ण स्थान सहसा देदीप्यमान हो गया। तत्पश्चात् भस्म लगानेसे श्वेत प्रभाववाले, नियम-व्रत धारण करनेवाले, पशुपतिके भक्त और महेश्वरके प्रति समर्पित बहुत-से सैकड़ों सिद्ध तथा महात्माओंने वहाँ आकर महेश्वरको प्रणाम किया; पुनः वे ध्यानयोगमें स्थित योगेश्वर [शिव]—को बार-बार देखकर अपने मनको स्थिर करके उन ईश्वरमें लीन होते हुए—से स्थित हो गये। उनके इस प्रकार स्थित होनेपर वे देवदेव उमापति परम मूर्ति धारण करते हुए विराट् पुरुषके रूपमें हो गये; वे सम्पूर्ण जगत्को एक स्थानपर एकत्र करनेके |

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