श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ९२] अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका माहात्म्य तथा श्रीविश्वेश्वरपूजाविधिवर्णन ४८३
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| स्थापितं ब्रह्मणा चापि सङ्गमे लिङ्गमुत्तमम्।<br>सङ्गमेश्वरमित्येवं ख्यातं जगति दृश्यताम्॥ ८८<br>सङ्गमे देवनद्या हि यः स्नात्वा मनुजः शुचिः।<br>अर्चयेत्सङ्गमेशानं तस्य जन्मभयं कुतः॥ ८९ | यह वरुणा नदी इस क्षेत्रको अलंकृत करके गंगाके साथ मिल जाती है। इनके संगमपर भी ब्रह्माके द्वारा उत्तम लिङ्ग स्थापित किया गया है; यह संगमेश्वर—इस नामसे जगत्में प्रसिद्ध है, तुम इसका दर्शन करो। देवनदीके संगमपर स्नान करके शुद्ध होकर जो मनुष्य संगमेश्वरकी पूजा करता है, उसे जन्मभय कहाँसे हो सकता है!॥ ८७—८९ ॥ |
| इदं मन्ये महाक्षेत्रं निवासो योगिनां परम्।<br>क्षेत्रमध्ये च यत्राहं स्वयं भूत्वाग्रमास्थितः॥ ९०<br>मध्यमेश्वरमित्येवं ख्यातः सर्वसुरासुरैः।<br>सिद्धानां स्थानमेतद्धि मदीयव्रतधारिणाम्॥ ९१<br>योगिनां मोक्षलिप्सूनां ज्ञानयोगरतात्मनाम्।<br>दृष्ट्वैनं मध्यमेशानं जन्म प्रति न शोचति॥ ९२ | [हे देवि!] मैं इसे महाक्षेत्र मानता हूँ; यह योगियोंका परम निवास-स्थान है। इस श्रेष्ठ क्षेत्रके मध्यमें मैं स्वयं प्रकट होकर अधिष्ठित हूँ। सभी सुर तथा असुर [यहाँ] मुझे मध्यमेश्वर—इस नामसे कहते हैं। मेरा व्रत धारण करनेवाले सिद्धों और मोक्षकी अभिलाषावाले तथा ज्ञानयोगमें परायण मनवाले योगियोंका यह निवास-स्थान है। इन मध्यमेश्वरका दर्शन कर लेनेपर मनुष्य अपने जन्मके विषयमें चिन्ता नहीं करता है॥ ९०—९२ ॥ |
| स्थापितं लिङ्गमेतत्तु शुक्रेण भृगुसूनुना।<br>नाम्ना शुक्रेश्वरं नाम सर्वसिद्धामरार्चितम्॥ ९३<br>दृष्ट्वैनं नियतः सद्यो मुच्यते सर्वकिल्बिषैः।<br>मृतश्च न पुनर्जन्तुः संसारी तु भवेन्नरः॥ ९४ | भृगुपुत्र शुक्राचार्यने भी यहाँ लिङ्गको स्थापित किया है; शुक्रेश्वर नामसे विख्यात यह लिङ्ग सभी सिद्धों तथा देवताओंसे पूजित है। नियमित होकर इनका दर्शन करके मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है और मरनेपर पुनः संसारी जीव नहीं होता है॥ ९३-९४॥ |
| पुरा जम्बुकरूपेण असुरो देवकण्टकः।<br>ब्रह्मणो हि वरं लब्ध्वा गोमायुर्बन्धशङ्कितः॥ ९५<br>निहतो हिमवत्पुत्रि जम्बुकेशस्ततो ह्यहम्।<br>अद्यापि जगति ख्यातं सुरासुरनमस्कृतम्॥ ९६<br>दृष्ट्वैनमपि देवेशं सर्वान् कामानवाप्नुयात्।<br>ग्रहैः शुक्रपुरोगैश्च एतानि स्थापितानि ह॥ ९७<br>पश्य पुण्यानि लिङ्गानि सर्वकामप्रदानि तु।<br>एवमेतानि पुण्यानि मन्निवासानि पार्वति॥ ९८<br>कथितानि मम क्षेत्रे गुह्यं चान्यदिदं शृणु।<br>चतुःक्रोशं चतुर्दिक्षु क्षेत्रमेतत्प्रकीर्तितम्॥ ९९ | पूर्वकालमें देवताओंके लिये कंटकस्वरूप एक दैत्य सियारके रूपमें विद्यमान था। अपने बन्धनसे सशंकित उस दैत्यने ब्रह्मासे वर प्राप्त करके गोमायु (सियार)-का रूप धारण कर लिया था। हे पार्वति! मैंने उसका वध किया और तब मैं जम्बुकेश कहा जाने लगा; आज भी लोकमें प्रसिद्ध तथा देवताओं और असुरोंसे नमस्कृत इन देवेश्वरका दर्शन करके मनुष्य समस्त कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। [हे देवि!] शुक्र आदि प्रधान ग्रहोंके द्वारा स्थापित किये गये इन पुण्यमय तथा सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले लिङ्गोंका दर्शन करो। हे पार्वति! इस प्रकार मैंने अपने निवासस्वरूप इन पवित्र लिङ्गोंका वर्णन किया; मेरे क्षेत्रमें एक अन्य गुप्त रहस्य भी है, इसे सुनो॥ ९५-९८ १/२॥ |