श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| रुद्रे देवे ममात्यन्तं परा भक्तिर्महत्तरा।<br>मयैव स्थापितं लिङ्गं तव नाम्ना भविष्यति॥ ७५ | देवतामें मेरी अत्यधिक, श्रेष्ठ तथा महत्तर भक्ति है; मेरे द्वारा स्थापित किया गया यह लिङ्ग आपके ही नामसे प्रसिद्ध होगा॥ ७१-७५॥ | | हिरण्यगर्भ इत्येवं ततोऽत्राहं समास्थितः।<br>दृष्ट्वैनमपि देवेशं मम लोकं व्रजेन्नरः॥ ७६<br><br>ततः पुनरपि ब्रह्मा मम लिङ्गमिदं शुभम्।<br>स्थापयामास विधिवद्भक्त्या परमया युतः॥ ७७<br><br>स्वर्लीनेश्वर इत्येवमत्राहं स्वयमागतः।<br>प्राणानिह नरस्त्यक्त्वा न पुनर्जायते क्वचित्॥ ७८ | [हे देवि!] मैं तभीसे यहाँ हिरण्यगर्भ—इस नामसे स्थित हूँ। इन देवेश्वरका दर्शन करके मनुष्य मेरा लोक प्राप्त करता है। तत्पश्चात् ब्रह्माने परम भक्तिसे युक्त होकर मेरे इस पवित्र लिङ्गको विधिपूर्वक पुनः स्थापित किया। मैं यहाँ स्वर्लीनेश्वर नामसे स्वयं विद्यमान हूँ; यहाँ प्राणत्याग करनेपर मनुष्य कभी जन्म नहीं लेता है। जो गति योगियोंकी कही गयी है, वह अनन्य गति उसकी भी होती है॥ ७६-७८ १/२॥ | | अनन्या सा गतिस्तस्य योगिनां चैव या स्मृता।<br>अस्मिन्नपि मया देशे दैत्यो दैवतकण्टकः॥ ७९<br><br>व्याघ्ररूपं समास्थाय निहतो दर्पितो बली।<br>व्याघ्रेश्वर इति ख्यातो नित्यमत्राहमास्थितः॥ ८०<br><br>न पुनदुर्गतिं याति दृष्ट्वैनं व्याघ्रीमीश्वरम्।<br>उत्पलो विदलश्चैव यौ दैत्यौ ब्रह्मणा पुरा॥ ८१<br><br>स्त्रीवध्यौ दर्पितौ दृष्ट्वा त्वयैव निहतौ रणे।<br>सावज्ञं कन्दुकेनात्र तस्येदं देहमास्थितम्॥ ८२ | इसी स्थानपर मैंने व्याघ्रका रूप धारण करके देवताओंके लिये कंटकस्वरूप एक अभिमानी तथा बलवान् दैत्यका वध किया था; [तभीसे] व्याघ्रेश्वर इस नामसे प्रसिद्ध होकर मैं यहाँ सदा स्थित हूँ। इन व्याघ्रेश्वरका दर्शन करके मनुष्य पुनः दुर्गति को प्राप्त नहीं होता है। पूर्वकालमें उत्पल तथा विदल नामक जिन दो दैत्योंके लिये ब्रह्माने स्त्रीके द्वारा वध्य होनेका विधान किया था, उन्हें अभिमानयुक्त देखकर आपने ही रणमें अवज्ञापूर्वक एक कन्दुकसे मार डाला था; आपके उसी कन्दुकका यह देह यहाँ स्थापित हो गया अर्थात् वह कन्दुक लिङ्गरूपमें परिणत होकर स्थापित हो गया॥ ७९-८२॥ | | आदावत्राहमागम्य प्रस्थितो गणपैः सह।<br>ज्येष्ठस्थानमिदं तस्मादेतन्मे पुण्यदर्शनम्॥ ८३<br><br>देवैः समन्तादेतानि लिङ्गानि स्थापितान्यतः।<br>दृष्ट्वापि नियतो मर्त्यो देहभेदे गणो भवेत्॥ ८४ | प्रारम्भमें गणपोंके साथ आकर मैं यहाँ स्थित हो गया, अतः यह ज्येष्ठस्थान है; यहाँ मेरा दर्शन पुण्यप्रद है। देवताओंने यहाँ सभी ओर इन लिङ्गोंको स्थापित किया है; अतः भक्तियुक्त होकर इन लिङ्गोंका केवल दर्शन करके मनुष्य मृत्यु होनेपर [शिवका] गण हो जाता है॥ ८३-८४॥ | | पित्रा ते शैलराजेन पुरा हिमवता स्वयम्।<br>मम प्रियहितं स्थानं ज्ञात्वा लिङ्गं प्रतिष्ठितम्॥ ८५<br><br>शैलेश्वरमिति ख्यातं दृश्यतामिह चादरात्।<br>दृष्ट्वैतन्मनुजो देवि न दुर्गतिमतो व्रजेत्॥ ८६ | [हे देवि!] पूर्वकालमें स्वयं तुम्हारे पिता पर्वत-राज हिमालयने इसे मेरा प्रिय तथा हितकर स्थान समझकर यहाँ लिङ्गकी स्थापना की थी। शैलेश्वर नामसे प्रसिद्ध इस लिङ्गको तुम आदरपूर्वक देखो। हे देवि! इसका दर्शन करके मनुष्य दुर्गति को नहीं प्राप्त होता है॥ ८५-८६॥ | | नद्येषा वरुणा देवि पुण्या पापप्रमोचनी।<br>क्षेत्रमेतदलङ्कृत्य जाह्नव्या सह सङ्गता॥ ८७ | हे देवि! पुण्यमयी तथा पापको नष्ट करनेवाली |