श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ९२ ] अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका माहात्म्य तथा श्रीविश्वेश्वरपूजाविधिवर्णन ४८१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| रंस्यते सोऽपि पद्माक्षि क्षेत्रेऽस्मिन् मुनिपुङ्गवः ।<br>ब्रह्मा देवर्षिभिः सार्धं विष्णुर्वापि दिवाकरः ॥ ६०<br>देवराजस्तथा शक्रो येऽपि चान्ये दिवौकसः ।<br>उपासते महात्मानः सर्वे मामिह सुव्रते ॥ ६१ | करनेवाले वे मुनिश्रेष्ठ भी इस क्षेत्रमें विहार करेंगे। हे सुव्रते ! देवर्षियोंके साथ ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य, देवराज इन्द्र अन्य देवता लोग तथा महात्मा—ये सब यहाँपर मेरी उपासना करते हैं॥ ५५-६१॥ |
| अन्येऽपि योगिनो दिव्याश्छन्नरूपा महात्मनः ।<br>अनन्यमनसो भूत्वा मामिहोपासते सदा ॥ ६२<br>विषयासक्तचित्तोऽपि त्यक्तधर्मरतिर्नरः ।<br>इह क्षेत्रे मृतः सोऽपि संसारे न पुनर्भवेत् ॥ ६३<br>ये पुनर्निर्ममा धीराः सत्त्वस्था विजितेन्द्रियाः ।<br>व्रतिनश्च निरारम्भाः सर्वे ते मयि भाविताः ॥ ६४<br>देवदेवं समासाद्य धीमन्तः सङ्गवर्जिताः ।<br>गता इह परं मोक्षं प्रसादान्मम सुव्रते ॥ ६५<br>जन्मान्तरसहस्रेषु यं न योगी समाप्नुयात् ।<br>तमिहैव परं मोक्षं प्रसादान्मम सुव्रते ॥ ६६ | अन्य दिव्य योगी तथा महात्मा लोग भी प्रच्छन्न [गुप्त] रूप धारणकर एकाग्रचित्त होकर यहाँपर सदा मेरी उपासना करते रहते हैं। विषयोंमें आसक्त मनवाला तथा धर्मका त्याग किया हुआ मनुष्य भी यदि इस क्षेत्रमें मृत हो जाय, तो वह भी संसारमें पुनः जन्म नहीं प्राप्त करता है; तो फिर हे सुव्रते ! जो ममतारहित, धीर, सत्त्वगुणमें स्थित, जितेन्द्रिय, व्रती, कर्मप्रवृत्तिसे रहित, मुझमें ध्यानरत, बुद्धिमान् तथा संगरहित हैं—वे सब [मुझ] देवदेवको प्राप्त करके मेरी कृपासे यहाँ श्रेष्ठ मोक्ष अवश्य प्राप्त करते हैं। हे सुव्रते ! हजारों जन्मोंमें भी योगी जिस [मोक्ष]-को प्राप्त नहीं कर पाता है, उस उत्तम मोक्षको वह यहाँपर मेरी कृपासे प्राप्त कर लेता है॥ ६२–६६॥ |
| गोप्रेक्षकमिदं क्षेत्रं ब्रह्मणा स्थापितं पुरा।<br>कैलासभवनं चात्र पश्य दिव्यं वरानने ॥ ६७<br>गोप्रेक्षकमथागम्य दृष्ट्वा मामत्र मानवः ।<br>न दुर्गतिमवाप्नोति कल्मषैश्च विमुच्यते ॥ ६८<br>कपिलाह्रदमित्येवं तथा वै ब्रह्मणा कृतम् ।<br>गवां स्तन्यजतोयेन तीर्थं पुण्यतमं महत् ॥ ६९<br>अत्रापि स्वयमेवाहं वृषध्वज इति स्मृतः ।<br>सान्निध्यं कृतवान् देवि सदाहं दृश्यते त्वया ॥ ७० | हे वरानने ! पूर्वकालमें यहाँ ब्रह्माके द्वारा स्थापित किये गये कैलास भवन नामक इस गोप्रेक्षक क्षेत्रको देखो। इस गोप्रेक्षक [क्षेत्र]-में आकर मेरा दर्शन करके मनुष्य दुर्गति नहीं प्राप्त करता है और पापोंसे छूट जाता है। इसी प्रकार यहाँपर ब्रह्माने गायोंके दूधसे कपिलाह्रद नामक विशाल तथा पुण्यतम तीर्थका निर्माण किया है। यहाँ भी मैं स्वयं वृषभध्वज—इस नामसे विख्यात हूँ। हे देवि ! मैंने सदासे यहाँ निवास किया है; ऐसा आप देखती भी हैं॥ ६७–७०॥ |
| भद्रतोयं च पश्येह ब्रह्मणा च कृतं ह्रदम्।<br>सर्वैर्देवैरहं देवि अस्मिन् देशे प्रसादितः ॥ ७१<br>गच्छोपशममीशेति उपशान्तः शिवस्तथा।<br>अत्राहं ब्रह्मणानीय स्थापितः परमेष्ठिना ॥ ७२<br>ब्रह्मणा चापि सङ्गृह्य विष्णुना स्थापितः पुनः ।<br>ब्रह्मणापि ततो विष्णुः प्रोक्तः संविग्नचेतसा ॥ ७३<br>मयानीतमिदं लिङ्गं कस्मात्स्थापितवानसि ।<br>तमुवाच पुनर्विष्णुर्ब्रह्माणं कुपिताननम् ॥ ७४ | यहाँ ब्रह्माके द्वारा निर्मित किये गये भद्रतोय नामक सरोवरको देखो। हे देवि! सभी देवताओंने 'हे ईश! शान्त हो जाइए'—ऐसा कहकर इस स्थानपर मुझ शिवको प्रसन्न किया था, तब मैं शान्त हो गया था। परमेष्ठी ब्रह्माने यहाँ लाकर मुझे स्थापित किया। ब्रह्माजीसे प्राप्त करके विष्णुने पुनः स्थापित किया। तब दुःखी चित्तवाले ब्रह्माने विष्णुसे कहा—आपने मेरे द्वारा लाये गये इस लिङ्गको क्यों स्थापित किया? तत्पश्चात् विष्णु कुपितमुखवाले उन ब्रह्मासे पुनः बोले—रुद्र |