भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 482
४८०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
है॥ ४२-४५ ^{१}/_{२} ॥
मम क्षेत्रमिदं तस्मादविमुक्तमिति स्मृतम्।<br>नैमिषे च कुरुक्षेत्रे गङ्गाद्वारे च पुष्करे॥ ४६<br>स्नानात्संसेवनाद्वापि न मोक्षः प्राप्यते यतः।<br>इह सम्प्राप्यते येन तत एतद्विशिष्यते॥ ४७<br>प्रयागे वा भवेन्मोक्ष इह वा मत्परिग्रहात्।<br>प्रयागादपि तीर्थाग्र्यादविमुक्तमिदं शुभम्॥ ४८नैमिषारण्य, कुरुक्षेत्र, हरिद्वार तथा पुष्करमें स्नान करने तथा वहाँ निवास करनेसे मोक्ष नहीं प्राप्त होता है, बल्कि यहाँ प्राप्त हो जाता है, अतः यह [अन्य तीर्थोंसे] विशिष्ट है। प्रयागमें अथवा यहाँपर मेरे परिग्रहके कारण मुक्ति होती है; तीर्थोंमें अग्रणी (श्रेष्ठ) प्रयागसे भी शुभ यह अविमुक्त [क्षेत्र] है॥ ४६-४८ ^{१}/_{२} ॥
धर्मस्योपनिषत्सत्यं मोक्षस्योपनिषच्छमः।<br>क्षेत्रतीर्थोपनिषदं न विदुर्बुधसत्तमाः॥ ४९धर्मका सारतत्त्व सत्य है, मोक्षका सारतत्त्व शम है; किंतु क्षेत्रतीर्थके सारतत्त्वको ऋषिगण भी नहीं जानते हैं॥ ४९॥
कामं भुञ्जन् स्वपन् क्रीडन् कुर्वन् हि विविधाः क्रियाः।<br>अविमुक्ते त्यजेत्प्राणान् जन्तुर्मोक्षाय कल्पते॥ ५०इच्छानुसार खाता हुआ, सोता हुआ, क्रीड़ा करता हुआ तथा अनेक क्रियाएँ करता हुआ भी प्राणी इस अविमुक्तक्षेत्रमें प्राणत्याग करे, तो वह मोक्ष प्राप्त करता है॥ ५०॥
कृत्वा पापसहस्राणि पिशाचत्वं वरं नृणाम्।<br>न तु शक्रसहस्रत्वं स्वर्गे काशीपुरीं विना॥ ५१<br>तस्मात्संसेवनीयं हि अविमुक्तं हि मुक्तये।<br>जैगीषव्यः परां सिद्धिं गतो यत्र महातपाः॥ ५२<br>अस्य क्षेत्रस्य माहात्म्याद्भक्त्या च मम भावितः।<br>जैगीषव्यगुहा श्रेष्ठा योगिनां स्थानमिष्यते॥ ५३<br>ध्यायन्तस्तत्र मां नित्यं योगाग्निर्दप्यते भृशम्।<br>कैवल्यं परमं याति देवानामपि दुर्लभम्॥ ५४यहाँ हजारों पाप करके पिशाचत्वको प्राप्त होना मनुष्योंके लिये अच्छा है, किंतु काशीपुरीको छोड़कर स्वर्गमें हजार बार इन्द्र होना अच्छा नहीं है। अतएव मुक्तिके लिये इस अविमुक्तक्षेत्रमें निवास करना चाहिये। महातपस्वी महर्षि जैगीषव्यने इस क्षेत्रके माहात्म्यसे तथा मेरी भक्तिसे युक्त होकर परम सिद्धि प्राप्त की थी। महर्षि जैगीषव्यकी श्रेष्ठ गुफा योगियोंकी स्थली मानी जाती है। योगी लोग वहाँ सदा मेरा ध्यान करते हैं और वहाँ योगकी अग्नि तीव्रतासे प्रज्वलित होती रहती है। मनुष्य [यहाँ] परम कैवल्य (मोक्ष) प्राप्त करता है, जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ है॥ ५१-५४॥
अव्यक्तलिङ्गैर्मुनिभिः सर्वसिद्धान्तवेदिभिः।<br>इह सम्प्राप्यते मोक्षो दुर्लभोऽन्यत्र कर्हिचित्॥ ५५<br>तेभ्यश्चाहं प्रवक्ष्यामि योगैश्वर्यमनुत्तमम्।<br>आत्मनश्चैव सायुज्यमीप्सितं स्थानमेव च॥ ५६अव्यक्त लिङ्गोंवाले तथा सभी सिद्धान्तोंको जाननेवाले मुनिगण यहाँ मोक्ष प्राप्त करते हैं, जो अन्यत्र कहीं भी दुर्लभ है। मैं उनके लिये अत्युत्तम योगैश्वर्य तथा अपने सायुज्यरूप अभीष्ट स्थानको बताऊँगा।
कुबेरोऽत्र मम क्षेत्रे मयि सर्वार्पितक्रियः।<br>क्षेत्रसंसेवनादेव गणेशत्वमवाप ह॥ ५७मेरे क्षेत्रमें अपनी सभी क्रियाएँ मुझमें समर्पित करनेवाले कुबेरने क्षेत्रके सेवनसे ही गणेशत्वको प्राप्त किया था।
संवर्तो भविता यश्च सोऽपि भक्तो ममैव तु।<br>इहैवाराध्य मां देवि सिद्धिं यास्यत्यनुत्तमाम्॥ ५८हे देवि! जो ऋषि संवर्त नामक मेरे भक्त जन्म लेंगे, वे भी यहाँ मेरी आराधना करके उत्तम सिद्धि प्राप्त करेंगे।
पाराशरसुतो योगी ऋषिव्यासो महातपाः।<br>मम भक्तो भविष्यश्च वेदसंस्थाप्रवर्तकः॥ ५९हे कमलनयने! महातपस्वी पराशरपुत्र योगी ऋषि व्यास मेरे भक्त होंगे; वेदसंहिताओंका प्रवर्तन
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