श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ९२] अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका माहात्म्य तथा श्रीविश्वेश्वरपूजाविधिवर्णन ४७९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| — | पुष्पोंसे इन देवदेव शंकरको भक्तिपूर्वक अलंकृत किया॥ ३३॥ |
| सम्पूज्य पूज्यं त्रिदशेश्वराणां<br>सम्प्रेक्ष्य चोद्यानमतीव रम्यम्।<br>गणेश्वरैर्नन्दिमुखैश्च सार्ध-<br>मुवाच देवं प्रणिपत्य देवी॥ ३४ | तदनन्तर उस अत्यन्त रम्य उद्यानको देखकर नन्दी आदि गणेश्वरोंके साथ देवताओंके लिये पूज्य देव [शंकर]-की पूजा करके और उन्हें प्रणामकर देवी [पार्वती] कहने लगीं॥ ३४॥ |
| श्रीदेव्युवाच<br>उद्यानं दर्शितं देव प्रभया परया युतम्।<br>क्षेत्रस्य च गुणान् सर्वान् पुनर्मे वक्तुमर्हसि॥ ३५<br>अस्य क्षेत्रस्य माहात्म्यमविमुक्तस्य सर्वथा।<br>वक्तुमर्हसि देवेश देवदेव वृषध्वज॥ ३६ | श्रीदेवी बोलीं—हे देव! आपने परम शोभासे युक्त उद्यानको मुझे दिखाया; अब आप इस क्षेत्रके समस्त गुणोंको मुझे बतानेकी कृपा करें। हे देवेश! हे देवदेव! हे वृषभध्वज! आप इस अविमुक्तक्षेत्रका माहात्म्य पूर्णरूपसे बतायें॥ ३५-३६॥ |
| सूत उवाच<br>देव्यास्तद्वचनं श्रुत्वा देवदेवो वरप्रभुः।<br>आघ्राय वदनाम्भोजं तदाह गिरिजां हसन्॥ ३७ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] तब देवीका वह वचन सुनकर देवदेव श्रेष्ठ प्रभु उनके मुखकमलको सूँघकर हँसते हुए पार्वतीसे कहने लगे॥ ३७॥ |
| श्रीभगवानुवाच<br>इदं गुह्यतमं क्षेत्रं सदा वाराणसी मम।<br>सर्वेषामेव जन्तूनां हेतुर्मोक्षस्य सर्वदा॥ ३८<br>अस्मिन् सिद्धाः सदा देवि मदीयं व्रतमास्थिताः।<br>नानालिङ्गधरा नित्यं मम लोकाभिकाङ्क्षिणः॥ ३९<br>अभ्यस्यन्ति परं योगं युक्तात्मानो जितेन्द्रियाः।<br>नानावृक्षसमाकीर्णे नानाविहगशोभिते॥ ४०<br>कमलोत्पलपुष्पाढ्यैः सरोभिः समलङ्कृते।<br>अप्सरोगणगन्धर्वैः सदा संसेविते शुभे॥ ४१ | श्रीभगवान् बोले—वाराणसी नामक यह मेरा नित्य गुह्यतम क्षेत्र है; यह सर्वदा सभी प्राणियोंके मोक्षका हेतु है। हे देवि! इस [क्षेत्र]-में सिद्ध लोग सदा मेरे व्रतमें स्थित रहते हैं और मेरे लोककी अभिलाषा करनेवाले लोग नित्य अनेकविध लिङ्गोंको धारण किये रहते हैं। अनेक प्रकारके वृक्षोंसे युक्त, अनेक प्रकारके पक्षियोंसे सुशोभित, कमल तथा उत्पलके पुष्पोंसे सम्पन्न सरोवरोंसे अलंकृत और अप्सराओं तथा गन्धर्वोंसे सेवित इस शुभ क्षेत्रमें युक्तात्मा जितेन्द्रिय लोग श्रेष्ठ योगका अभ्यास करते हैं॥ ३८-४१॥ |
| रोचते मे सदा वासो येन कार्येण तच्छृणु।<br>मन्मना मम भक्तश्च मयि नित्यार्पितक्रियः॥ ४२<br>यथा मोक्षमवाप्नोति अन्यत्र न तथा क्वचित्।<br>कामं ह्यत्र मृतो देवि जन्तुर्मोक्षाय कल्पते॥ ४३<br>एतन्मम पुरं दिव्यं गुह्याद् गुह्यतमं महत्।<br>ब्रह्मादयो विजानन्ति ये च सिद्धा मुमुक्षवः॥ ४४<br>अतः परमिदं क्षेत्रं परा चेयं गतिर्मम।<br>विमुक्तं न मया यस्मान्मोक्ष्यते वा कदाचन॥ ४५ | [हे देवि!] जिस कारणसे मुझे यहाँ निवास करना अच्छा लगता है, उसे सुनो। मुझमें अपने मनको स्थिर रखनेवाला तथा मुझमें सदा सभी क्रियाएँ अर्पित करनेवाला मेरा भक्त जिस प्रकारका मोक्ष यहाँ प्राप्त करता है, वैसा अन्यत्र कहीं भी नहीं। हे देवि! यहाँ मरनेवाला प्राणी मोक्ष प्राप्त करता है। मेरा यह पुर दिव्य, गुह्यसे भी गुह्यतम तथा महान् है—इसे ब्रह्मा आदि, सिद्धगण तथा मुक्तिके इच्छुक लोग जानते हैं। अतः यह परम क्षेत्र मेरी परम गति है। मैंने कभी भी इसका त्याग नहीं किया है और न तो कभी इसका त्याग करूँगा, अतः मेरा यह क्षेत्र अविमुक्त कहा गया |