भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 480
संस्पृष्टैः क्वचिदुपलिप्तकीर्णपुष्पै-<br>रावासैः परिवृतपादपं मुनीनाम्।<br>आमूलात्फलनिचितैः क्वचिद्विशालै-<br>रुत्तुङ्गैः पनसमहीरुहैरुपेतम्॥ २५-२६वह कहीं लीपी हुई, परस्पर सटी हुई तथा बिखरे पुष्पोंसे सुशोभित मुनियोंकी कुटियोंसे घिरे हुए वृक्षोंसे समन्वित है। वह कहीं जड़से ही फलोंसे लदे हुए, विशाल तथा ऊँचे कटहलके वृक्षोंसे व्याप्त है॥ २५-२६॥
फुल्लातिमुक्तकलतागृहनीतसिद्ध-<br>सिद्धाङ्गनाकनकनूपुररावरम्यम् ।<br>रम्यं प्रियङ्गुतरुमञ्जरिसक्तभृङ्गं<br>भृङ्गावलीकवलिताम्रकदम्बपुष्पम् ॥ २७वह उद्यान पूर्णतः पुष्पित लतागृहोंमें ले जायी गयी सिद्धोंकी सिद्धांगनाओंके सुवर्णमय नूपुरकी ध्वनिसे रमणीय है, प्रियंगु वृक्षोंकी मंजरियोंपर मँडराते हुए भौंरोंसे सुशोभित है और भौंरोंकी पंक्तियोंसे आस्वादित आम्र तथा कदम्बके पुष्पोंसे समन्वित है॥ २७॥
पुष्पोत्करानिलविधूर्णितवारिरम्यं<br>रम्यद्विरेफविनिपातितमञ्जुगुल्मम् ।<br>गुल्मान्तरप्रसभभीतमृगीसमूहं<br>वातेरितं तनुभृतामपवर्गदातृ॥ २८वह उद्यान पुष्पसमूहोंसे सुवासित वायुसे आन्दोलित जलाशयोंसे सुशोभित है, भौंरोंके द्वारा गिराये गये सुन्दर पुष्पोंके गुच्छोंसे युक्त है, वृक्षकुंजोंमें अत्यधिक डरी हुई हिरणियोंके झुण्डोंसे मण्डित है और वायुसे प्रेरित है। वह उद्यान मनुष्योंको मोक्ष देनेवाला है॥ २८॥
चंद्रांशुजालशबलैस्तिलकैर्मनोज्ञैः<br>सिन्दूरकुङ्कुमकुसुम्भनिभैरशोकैः ।<br>चामीकरद्युतिसमैरथ कर्णिकारैः<br>पुष्पोत्करैरुपचितं सुविशालशाखैः॥ २९वह चन्द्रमाकी किरणोंके जालसे विविध रंगोंवाले मनोहर तिलकवृक्षोंसे युक्त है, सिन्दूर-कुंकुम तथा कुसुम्भ रंगकी आभावाले अशोक वृक्षोंसे युक्त है और सुवर्णकी कान्तिवाले, विशाल शाखाओंवाले तथा पुष्पोंसे लदे हुए कनेर वृक्षोंसे युक्त है॥ २९॥
क्वचिदञ्जनचूर्णाभैः क्वचिद्विद्रुमसन्निभैः।<br>क्वचित्काञ्चनसङ्काशैः पुष्पैराचितभूतलम्॥ ३०उस उद्यानकी भूमि कहीं-कहीं अंजनके चूर्णके समान आभावाले, कहीं विद्रुमके समान कान्तिवाले और कहीं सुवर्णसदृश प्रभाववाले पुष्पोंसे आच्छादित रहती थी॥ ३०॥
पुन्नागेषु द्विजशतविरुतं<br>रक्ताशोकस्तबकभरनतम् ।<br>रम्योपान्तक्लमहरभवनं<br>फुल्लाब्जेषु भ्रमरविलसितम्॥ ३१उस उद्यानमें पुन्नागके वृक्षोंपर सैकड़ों पक्षियोंकी ध्वनि होती रहती थी, गुच्छोंके भारसे रक्त अशोकवृक्ष झुके रहते थे, रम्य सीमास्थलपर थकानको हरनेवाले भवन थे और खिले हुए कमलोंपर भौंरे मँडराते रहते थे॥ ३१॥
सकलभुवनभर्ता लोकनाथस्तदानीं<br>तुहिनशिखरपुत्र्या सार्धमिष्टैर्गणेशैः।<br>विविधतरुविशालं मत्तहृष्टान्नपुष्टै-<br>रुपवनमतिरम्यं दर्शयामास देव्याः॥ ३२उस समय हिमालयपुत्री [पार्वती] और मत्त, प्रसन्न तथा शरीरसे पुष्ट प्रिय गणेश्वरोंके साथ विद्यमान सम्पूर्ण भवनोंके भर्ता शिवने अनेकविध विशाल वृक्षोंवाले अत्यन्त रम्य उपवनको देवीको दिखाया॥ ३२॥
पुष्पैर्वन्यैः शुभ्रशुभतमैः कल्पितैर्दिव्यभूषै-<br>र्देवीं दिव्यामुपवनगतां भूषयामास शर्वः।<br>सा चाप्येनं तुहिनगिरिसुता शङ्करं देवदेवं<br>पुष्पैर्दिव्यैः शुभतरतमैर्भूषयामास भक्त्या॥ ३३शिवजीने अत्यन्त सुन्दर वन्य पुष्पोंसे बनाये गये दिव्य आभूषणोंसे उपवनमें गयी हुई दिव्य देवीको सजाया और उन पार्वतीने भी अत्यन्त सुन्दर दिव्य