श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| अध्याय ९२ ] | अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका माहात्म्य तथा श्रीविश्वेश्वरपूजाविधिवर्णन | ४७७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| क्वचिच्च दन्तक्षतचारुवीरुधं<br>क्वचिल्लतालिङ्गितचारुवृक्षकम् ।<br>क्वचिद्विलासालसगामिनीभि-<br>र्निषेवितं किम्पुरुषाङ्गनाभिः॥ २० | पक्षियोंसे युक्त था, [सभी ओर] ध्वनि होनेसे यह अति सुन्दर था, खिले हुए पुष्पोंवाले वृक्षोंकी शाखाओंमें विद्यमान मस्त भौरोंसे सुशोभित था, नूतन कलियोंकी सुन्दरतासे सुशोभित था और ऊँची-ऊँची शाखाओंसे युक्त था ॥ १९ ॥<br><br>वह उद्यान कहीं-कहीं दाँतोंसे क्षत की गयी सुन्दर लताओंसे सुशोभित था, कहीं-कहीं लताओंसे वेष्टित वृक्षोंसे मण्डित था और कहीं-कहीं विलासके कारण मन्थर गतिवाली किंपुरुष अंगनाओंसे सेवित था ॥ २० ॥ |
| पारावतध्वनिविकूजितचारुशृङ्गै-<br>रभ्रङ्कषैः सितमनोहरचारुरूपैः।<br>आकीर्णपुष्यनिकरप्रविभक्तहंसै-<br>र्विभ्राजितं त्रिदशदिव्यकुलैरनेकः॥ २१<br><br>फुल्लोत्पलाम्बुजवितानसहस्रयुक्तं<br>तोयाशयैः समनुशोभितदेवमार्गम्।<br>मार्गान्तराकलितपुष्पविचित्रपंक्ति-<br>सम्बद्धगुल्मविटपैर्र्विविधैरुपेतम् ॥ २२ | वह उद्यान पारावत पक्षियोंकी ध्वनिसे निनादित तथा गगनचुम्बी शृंगोंवाले वृक्षोंसे, बिखरे हुए पुष्पसमूहोंको विभक्त कर देनेवाले श्वेत वर्णके मनोहर तथा सुन्दर रूपवाले हंसोंसे और अनेक देवताओंके दिव्य कुलोंसे सुशोभित है। वह विकसित नीलकमलके हजारों वितानोंसे युक्त है, जलाशयोंसे सुशोभित देवमार्गवाला है और मार्गके मध्यमें खिले हुए विचित्र पुष्पोंकी पंक्तिसे सम्बद्ध विविध गुल्मों तथा विटपोंसे समन्वित है॥ २१-२२॥ |
| तुङ्गाग्रैर्नीलपुष्पैस्तबकभरनतप्रांशुशाखैरशोकै-<br>र्दोलान्तान्तालीनश्रुतिसुखजनकैर्भासितान्तं मनोज्ञैः।<br>रात्रौ चन्द्रस्य भासा कुसुमिततिलकैरेकतां सम्प्रयातं<br>छायासुप्तप्रबुद्धस्थितहरिणकुलालुप्तदूर्वाङ्कुराग्रम् ॥ २३<br><br>हंसानां पक्षवातप्रचलितकमलस्वच्छविस्तीर्णतोयं<br>तोयानां तीरजातप्रचकितकदलीचाटुनृत्यन्मयूरम् ।<br>मायूरैः पक्षचन्द्रैः क्वचिदवनिगतैरञ्जितक्ष्माप्रदेशं<br>देशे देशे विलीनप्रमुदितविलसन् मत्तहारीतवृन्दम् ॥ २४ | उस वनका प्रान्तभाग तुंग अग्रभागवाले, नीलपुष्प-गुच्छोंके भारसे झुकी हुई ऊँची शाखाओंवाले, वायुके द्वारा आन्दोलित होनेपर कानोंको सुख देनेवाली ध्वनिसे भासित अन्तर्भागवाले मनोहर अशोक वृक्षोंसे युक्त है। वह रात्रिमें चन्द्रकी किरणोंसे कुसुमित तिलक वृक्षोंके साथ एकताको प्राप्त है और छायामें सोकर उठे हुए हरिणके समुदायके द्वारा चरे गये दूर्वांकुरोंके अग्रभागोंसे युक्त है। वह हंसोंके पंखोंकी वायुसे हिले हुए कमल तथा स्वच्छ और विस्तीर्ण जलसे समन्वित है, सरोवरोंके तटपर उत्पन्न तथा चकित कर देनेवाले कदलीपत्रोंकी चाटुकारितामें नाचते हुए मयूरोंसे युक्त है, कहीं पृथ्वीपर मयूरोंके पंखमें स्थित चन्दासे अलंकृत भूभागसे सुशोभित है और स्थान-स्थानपर छिपे हुए प्रमुदित, मत्त तथा क्रीड़ा करते हुए हारीत पक्षिसमूहोंसे सुशोभित है॥ २३-२४॥ |
| सारङ्गैः क्वचिदुपशोभितप्रदेशं<br>प्रच्छन्नं कुसुमचयैः क्वचिद्विचित्रैः।<br>हृष्टाभिः क्वचिदपि किन्नराङ्गनाभि-<br>र्वीणाभिः सुमधुरगीतनृत्तकण्ठम् ॥ २५ | वह उद्यान सारंग हरिणोंसे कहीं-कहीं सुशोभित भागवाला है, कहीं-कहीं विकसित पुष्पोंसे आच्छादित है। कहीं-कहीं प्रसन्नचित्त किन्नरांगनाओंके द्वारा बजायी गयी वीणाओंकी मधुर ध्वनि-गान-नृत्यसे सुशोभित है। |