श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 487, कुल 834 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ९२ ] अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका माहात्म्य तथा श्रीविश्वेश्वरपूजाविधिवर्णन ४८५
| तस्य तां परमां मूर्तिमास्थितस्य जगत्प्रभोः।<br>न शशाक पुनर्द्रष्टुं हृष्टरोमा गिरीन्द्रजा ॥ ११४<br>ततस्त्वदृष्टमाकारं बुद्ध्वा सा प्रकृतिस्थितम्।<br>प्रकृतेर्मूर्तिमास्थाय योगेन परमेश्वरी ॥ ११५<br>तं शशाक पुनर्द्रष्टुं हरस्य च महात्मनः।<br>ततस्ते लयमाधाय योगिनः पुरुषस्य तु ॥ ११६<br>विविशुर्हृदयं सर्वे दग्धसंसारबीजिनः।<br>पञ्चाक्षरस्य वै बीजं संस्मरन्तः सुशोभनम् ॥ ११७<br>सर्वपापहरं दिव्यं पुरा चैव प्रकाशितम्।<br>नीललोहितमूर्तिस्थं पुनश्चक्रे वपुः शुभम् ॥ ११८<br>तं दृष्ट्वा शैलजा प्राह हृष्टसर्वतनूरुहा।<br>स्तुवती चरणौ नत्वा क इमे भगवन्निति ॥ ११९<br>तामुवाच सुरश्रेष्ठस्तदा देवीं गिरीन्द्रजाम्।<br><br>श्रीभगवानुवाच<br>मदीयं व्रतमाश्रित्य भक्तिमद्भिर्द्विजोत्तमैः ॥ १२०<br>यैर्यैर्योग इहाभ्यस्तास्तेषामेकेन जन्मना।<br>क्षेत्रस्यास्य प्रभावेन भक्त्या च मम भामिनि ॥ १२१<br>अनुग्रहो मया ह्येवं क्रियते मूर्तितः स्वयम्।<br>तस्मादेतन्महत्क्षेत्रं ब्रह्माद्यैः सेवितं तथा ॥ १२२<br>श्रुतिमद्भिश्च विप्रेन्द्रैः संसिद्धैश्च तपस्विभिः।<br>प्रतिमासं तथाष्टम्यां प्रतिमासं चतुर्दशीम् ॥ १२३<br>उभयोः पक्षयोर्देवि वाराणस्यामुपास्यते।<br>शशिभानूपरागे च कार्तिका्यां च विशेषतः ॥ १२४<br>सर्वपर्वसु पुण्येषु विषुवेष्वयनेषु च।<br>पृथिव्यां सर्वतीर्थानि वाराणस्यां तु जाह्नवीम् ॥ १२५<br>उत्तरप्रवहां पुण्यां मम मौलिविनिःसृताम्।<br>पितुस्ते गिरिराजस्य शुभां हिमवतः सुताम् ॥ १२६<br>पुण्यस्थानस्थितां पुण्यां पुण्यदिक्प्रवहां सदा।<br>भजन्ते सर्वतोऽभ्येत्य ये ताञ्छृणु वरानने ॥ १२७ | लिये प्रलयकालके समान खड़े हो गये॥ १०८–११३॥<br><br>तब पुलकित रोमोंवाली पार्वती वहाँ स्थित उन जगत्प्रभुकी उस परम मूर्तिको पुनः देखनेमें समर्थ न हो सकीं। तदनन्तर पहले कभी न देखे गये उस स्वरूपको प्रकृतिमें स्थित समझकर वे परमेश्वरी योगके द्वारा प्रकृतिका रूप धारणकर महात्मा शिवके उस स्वरूपको पुनः देखनेमें समर्थ हो गयीं॥ ११४-११५ १/२॥<br><br>तब अत्यन्त सुन्दर पंचाक्षर मन्त्रका स्मरण करते हुए दग्ध लिङ्गवाले वे सभी योगी शिवके ध्यानमें लीन होकर उन [विराट्] पुरुषके हृदयमें प्रविष्ट हुए। तदनन्तर शिवजीने सभी पापोंका हरण करनेवाले, दिव्य तथा पूर्वमें प्रकट किये गये नीललोहितमूर्तिस्थ रूपको पुनः धारण किया॥ ११६–११८॥<br><br>उस रूपको देखकर पुलकित समस्त रोमोंवाली पार्वती स्तुति करते हुए तथा उनके चरणोंमें प्रणाम करके कहा—‘हे भगवन्! ये कौन हैं?’ तब सुरश्रेष्ठ [शिव] पर्वतराजकी उन पुत्रीसे कहने लगे॥ ११९ १/२॥<br><br>श्रीभगवान् बोले—हे भामिनि! मेरे व्रतका आश्रय लेकर जिन-जिन भक्तियुक्त श्रेष्ठ द्विजोंने यहाँ योगका अभ्यास किया है, उनके एक जन्ममें ही इस क्षेत्रके प्रभाव तथा उनकी भक्तिके कारण मैं स्वयं विग्रहरूपसे इस प्रकारका अनुग्रह करता हूँ। अतः यह महान् क्षेत्र ब्रह्मा आदि [देवताओं], वेदज्ञ श्रेष्ठ ब्राह्मणों, सिद्धों तथा तपस्वियोंके द्वारा सेवित है। हे देवि! प्रत्येक महीनेमें दोनों पक्षोंकी अष्टमी तथा चतुर्दशीको वाराणसीमें शिवकी पूजा की जाती है। सूर्यग्रहण तथा चन्द्रग्रहणके अवसरपर, विशेषकर कार्तिक महीनेमें, पुण्यप्रद सभी पर्वोंमें, विषुवत् एवं अयन संक्रान्तियोंमें पृथ्वीपर स्थित सभी तीर्थ वाराणसीमें विद्यमान उत्तरवाहिनी, पुण्यमयी, मेरे सिरसे निकली हुई, तुम्हारे पिता गिरिराज हिमालयकी पुत्री, पुण्यमयस्थानमें विराजमान और सदा पुण्य दिशाकी ओर प्रवाहित होनेवाली पवित्र गंगाका सेवन करते हैं। हे वरानने! सभी ओरसे आकर जो उन भागीरथीका सेवन करते हैं, उन्हें सुनो॥ १२०–१२७॥ |