भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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| ४८६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |

| सन्निहत्य कुरुक्षेत्रं सार्धं तीर्थशतैस्तथा।<br>पुष्करं निमिषं चैव प्रयागं च पृथूदकम्॥ १२८<br>द्रुमक्षेत्रं कुरुक्षेत्रं नैमिषं तीर्थसंयुतम्।<br>क्षेत्राणि सर्वतो देवि देवता ऋषयस्तथा॥ १२९<br>सन्ध्या च ऋतवश्चैव सर्वा नद्यः सरांसि च।<br>समुद्राः सप्त चैवात्र देवतीर्थानि कृत्स्नशः॥ १३०<br>भागीरथीं समेष्यन्ति सर्वपर्वसु सुव्रते।<br>अविमुक्तेश्वरं दृष्ट्वा दृष्ट्वा चैव त्रिविष्टपम्॥ १३१<br>कालभैरवमासाद्य धूतपापानि सर्वशः।<br>भवन्ति हि सुरेशानि सर्वपर्वसु पर्वसु॥ १३२<br>पृथिव्यां यानि पुण्यानि महत्यायतनानि च।<br>प्रविशन्ति सदाभ्येत्य पुण्यं पर्वसु पर्वसु।<br>अविमुक्तं क्षेत्रवरं महापापनिबर्हणम्॥ १३३ | हे देवि! हे सुव्रते! कुरुक्षेत्र, पुष्कर, निमिष, प्रयाग, पृथूदक, द्रुमक्षेत्र, कुरुक्षेत्र, तीर्थमय नैमिष, सभी क्षेत्र, देवता, ऋषिगण, सन्ध्या, ऋतुएँ, सभी नदियाँ, सभी सरोवर, सातों समुद्र तथा समस्त देवतीर्थ एकीभूत होकर सैकड़ों तीर्थोंसहित सभी पर्वोंके अवसरपर भागीरथीमें आकर मिल जाते हैं और हे सुरेशानि! सभी पर्वोंपर अविमुक्तेश्वर तथा त्रिविष्टपका दर्शन करके पुनः कालभैरव पहुँचकर पूर्णरूपसे पापमुक्त हो जाते हैं। पृथिवीपर जो भी पवित्र तथा महान् आयतन (देवालय) हैं, वे समस्त पर्वोंके अवसरपर महापापोंका नाश करनेवाले क्षेत्रश्रेष्ठ पुण्यमय अविमुक्तमें आकर प्रविष्ट हो जाते हैं॥ १२८-१३३॥ | | केदारे चैव यल्लिङ्गं यच्च लिङ्गं महालये॥ १३४<br>मध्यमेश्वरसंज्ञं च तथा पाशुपतेश्वरम्।<br>शङ्कुकर्णेश्वरं चैव गोकर्णौ च तथा ह्युभौ॥ १३५<br>द्रुमचण्डेश्वरं नाम भद्रेश्वरमनुत्तमम्।<br>स्थानेश्वरं तथैकाग्रं कालेश्वरमजेश्वरम्॥ १३६<br>भैरवेश्वरमीशानं तथोङ्कारकसञ्ज्ञितम्।<br>अमरेशं महाकालं ज्योतिषं भस्मगात्रकम्॥ १३७<br>यानि चान्यानि पुण्यानि स्थानानि मम भूतले।<br>अष्टषष्टिसमाख्यानि रूढान्यान्यानि कृत्स्नशः॥ १३८<br>तानि सर्वाण्यशेषाणि वाराणस्यां विशन्ति माम्।<br>सर्वपर्वसु पुण्येषु गुह्यं चैतदुदाहृतम्॥ १३९<br>तेनेह लभते जन्तुर्मृतो दिव्यामृतं पदम्। | केदार [खण्ड]-में स्थित लिङ्ग, महालयमें स्थित लिङ्ग, मध्यमेश्वर नामक लिङ्ग, पाशुपतेश्वर, शंकुकर्णेश्वर, दोनों गोकर्णेश्वर, द्रुमचण्डेश्वर, अत्युत्तम भद्रेश्वर, स्थानेश्वर, एकाग्रेश्वर, कालेश्वर, अजेश्वर, भैरवेश्वर, ईशान, ओंकारेश्वर, अमरेश्वर, महाकालेश्वर, ज्योतिष, भस्मगात्र आदि तथा अन्य जो प्रसिद्ध अड़सठ मेरे पवित्र स्थान इस भूतलपर हैं एवं जो अन्य सभी लोकप्रसिद्ध स्थान हैं; वे सब वाराणसीमें मेरे पास सभी पुण्यप्रद पर्वोंपर आ जाते हैं। [हे देवि!] इसी कारणसे यहाँपर मृत्युको प्राप्त प्राणी दिव्य अमृत (अमर) पद प्राप्त करता है; मैंने यह रहस्यमय बात कही है॥ १३४-१३९ १/२॥ | | स्नातस्य चैव गङ्गायां दृष्टेन च मया शुभे॥ १४०<br>सर्वयज्ञफलैस्तुल्यमिष्टैः शतसहस्रशः।<br>सद्य एव समाप्नोति किं ततः परमाद्भुतम्॥ १४१<br>सर्वायतनमुख्यानि दिवि भूमौ गिरिष्वपि।<br>परात्परतरं देवि बुध्यस्वेति मयोदितम्॥ १४२<br>अविशब्देन पापस्तु वेदोक्तः कथ्यते द्विजैः।<br>तेन मुक्तं मया जुष्टमविमुक्तमतोच्यते॥ १४३ | हे शुभे! [वाराणसीमें] गंगामें स्नान करके मेरा दर्शन करनेसे मनुष्य सैकड़ों-हजारों समस्त यज्ञोंके अभीष्ट फलोंके समान फल शीघ्र ही प्राप्त करता है, इससे बढ़कर आश्चर्य क्या हो सकता है? हे देवि! स्वर्गमें, पृथ्वीपर तथा पर्वतोंपर जो भी सभी प्रधान देवस्थान हैं, उनमें मेरे द्वारा बताये गये इस वाराणसीक्षेत्रको सबसे श्रेष्ठ जानो। ब्राह्मणोंने वेदोंमें वर्णित पापको 'अवि' शब्दसे कहा है; यह क्षेत्र उस [पाप]-से मुक्त है तथा मेरे द्वारा सेवित है, अतः इसे 'अविमुक्त' कहा जाता है॥ १४०-१४३॥ |