श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय १२] अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका माहात्म्य तथा श्रीविश्वेश्वरपूजाविधिवर्णन ४८७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| इत्युक्त्वा भगवान् रुद्रः सर्वलोकमहेश्वरः।<br>सुदृष्टं कुरु देवेशि अविमुक्तं गृहं मम॥ १४४<br>इत्युक्त्वा भगवान् देवस्तया सार्धमुमापतिः।<br>दर्शयामास भगवान् श्रीपर्वतमनुत्तमम्॥ १४५<br>अविमुक्तेश्वरं नित्यमवसच्च सदा तया।<br>सर्वगत्वाच्च सर्वत्वात्सर्वात्मा सदसन्मयः॥ १४६<br>श्रीपर्वतमनुप्राप्य देव्या देवेश्वरो हरः।<br>क्षेत्राणि दर्शयामास सर्वभूतपतिर्भवः॥ १४७ | ऐसा कहकर सभी लोकोंके स्वामी भगवान् रुद्र पुनः बोले—‘देवेशि! मेरे इस अविमुक्त निवास-स्थानको भली-भाँति देखो।’ ऐसा कहनेके बाद उन देवीको साथ लेकर भगवान् उमापतिने उन्हें अत्युत्तम श्रीपर्वत दिखाया और वे वहाँ अविमुक्तेश्वरमें उनके साथ नित्य रहने लगे। सर्वत्र गमनकी शक्तिसे युक्त होने तथा सर्वव्यापी होनेके कारण सर्वात्मा, सत्-असत्स्वरूपवाले, देवताओंके स्वामी तथा सभी प्राणियोंके स्वामी भगवान् शिव उन देवीके साथ श्रीपर्वतपर पहुँचकर वहाँके [पवित्र] क्षेत्र दिखाने लगे॥ १४४-१४७॥ |
| कुण्डिप्रभं च परमं दिव्यं वैश्रवणेश्वरम्।<br>आशालिङ्गं च देवेशं दिव्यं यच्च बिलेश्वरम्॥ १४८<br>रामेश्वरं च परमं विष्णुना यत्प्रतिष्ठितम्।<br>दक्षिणद्वारपार्श्वे तु कुण्डलेश्वरमीश्वरम्॥ १४९<br>पूर्वद्वारसमीपस्थं त्रिपुरान्तकमुत्तमम्।<br>विवृद्धं गिरिणा सार्धं देवदेवनमस्कृतम्॥ १५०<br>मध्यमेश्वरमित्युक्तं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्।<br>अमरेश्वरं च वरदं देवैः पूर्वं प्रतिष्ठितम्॥ १५१<br>गोचर्मेश्वरमीशानं तथेन्द्रेश्वरमद्भुतम्।<br>कर्मेश्वरं च विपुलं कार्यार्थं ब्रह्मणा कृतम्॥ १५२<br>श्रीमत्सिद्धवटं चैव सदावासो ममाव्यये।<br>अजेन निर्मितं दिव्यं साक्षादजबिलं शुभम्॥ १५३<br>तत्रैव पादुके दिव्ये मदीये च बिलेश्वरे।<br>तत्र शृङ्गाटकाकारं शृङ्गाटाचलमध्यमे॥ १५४<br>शृङ्गाटकेश्वरं नाम श्रीदेव्या तु प्रतिष्ठितम्।<br>मल्लिकार्जुनकं चैव मम वासमिदं शुभम्॥ १५५<br>राजेश्वरं च पर्याये रजसा सुप्रतिष्ठितम्।<br>गजेश्वरं च वैशाखं कपोतेश्वरमव्ययम्॥ १५६<br>कोटीश्वरं महातीर्थं रुद्रकोटिगणैः पुरा।<br>सेवितं देवि पश्याद्य सर्वस्मादधिकं शुभम्॥ १५७ | यहाँ कुण्डिप्रभ, परम दिव्य वैश्रवणेश्वर, आशालिङ्ग, देवेश्वर, दिव्य बिलेश्वर, विष्णुके द्वारा स्थापित महान् रामेश्वर, दक्षिण द्वारके पार्श्वभागमें भगवान् कुण्डलेश्वर, पूर्व द्वारके समीप स्थित और पर्वतके साथ वृद्धिको प्राप्त सर्वदेवनमस्कृत उत्तम त्रिपुरान्तक, तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध मध्यमेश्वर, पूर्वकालमें देवताओंके द्वारा स्थापित वरप्रद अमरेश्वर, गोचर्मेश्वर, ईशान, अद्भुत इन्द्रेश्वर और अपने कार्यके लिये ब्रह्माके द्वारा स्थापित विशाल कर्मेश्वर लिङ्ग हैं। हे अव्यये! श्रीमत्सिद्धवट सदा मेरा निवासस्थान है। साक्षात् ब्रह्माके द्वारा निर्मित यह दिव्य तथा पवित्र अजबिल नामक स्थान है; वहीं बिलेश्वरमें मेरी दिव्य पादुकाएँ भी हैं। वहाँ शृङ्गाटक पर्वतके मध्य शिखरपर शृङ्गाटकके आकारवाला (त्रिकोण) शृङ्गाटकेश्वर नामक लिङ्ग है, जो श्रीदेवी (लक्ष्मी)-के द्वारा स्थापित किया गया है। यह मल्लिकार्जुन [लिङ्ग] मेरा शुभ निवासस्थान है। हे देवि! युगादिके परिवर्तित होनेपर ब्रह्माके द्वारा स्थापित राजेश्वरको, स्कन्दके द्वारा स्थापित गजेश्वरको, अविनाशी कपोतेश्वरको तथा सबसे अधिक शुभ और करोड़ों रुद्रगणोंके द्वारा सेवित कोटीश्वर नामक महातीर्थको इस समय देखो॥ १४८-१५७॥ |
| द्विदेवकुलसंज्ञं च ब्रह्मणा दक्षिणे शुभम्।<br>उत्तरे स्थापितं चैव विष्णुना चैव शैलजम्॥ १५८<br>महाप्रमाणलिङ्गं च मया पूर्वं प्रतिष्ठितम्।<br>पश्चिमे पर्वते पश्य ब्रह्मोश्वरमलेश्वरम्॥ १५९ | दक्षिणमें ब्रह्माके द्वारा तथा उत्तरमें विष्णुके द्वारा स्थापित किये गये पाषाणनिर्मित सुन्दर द्विदेवकुल नामक लिङ्गको, पूर्वमें मेरे द्वारा स्थापित महाप्रमाण लिङ्ग तथा पश्चिममें पर्वतपर स्थित ब्रह्मोश्वर अलेश्वर नामक |