भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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| ४८८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |

Sanskrit ShlokaHindi Translation
अलङ्कृतं त्वया ब्रह्मन् पुरस्तान्मुनिभिः सह।<br>इत्युक्त्वा तद्गृहेऽतिष्ठदलङ्गृहमिति स्मृतम्॥ १६०लिङ्गको देखो। महादेवने ब्रह्मासे कहा था—‘हे ब्रह्मन्! आपने मुनियोंके साथ इसे अलंकृत किया है’—ऐसा कहकर वे रुद्र उस गृहमें स्थित हो गये, अतः उसे अलंगृह कहा गया है॥ १५८–१६०॥
तत्रापि तीर्थं तीर्थज्ञे व्योमलिङ्गं च पश्य मे।<br>कदम्बेश्वरमेतद्धि स्कन्देनैव प्रतिष्ठितम्॥ १६१<br><br>गोमण्डलेश्वरं चैव नन्दाद्यैः सुप्रतिष्ठितम्।<br>देवैः सर्वैस्तु शक्राद्यैः स्थापितानि वरानने॥ १६२<br><br>श्रीमद्देवह्रदप्रान्ते स्थानानीमानि पश्य मे।<br>तथा हारपुरे देवि तव हारे निपातिते॥ १६३<br><br>त्वया हिताय जगतां हारकुण्डमिदं कृतम्।<br>शिवरुद्रपुरे चैव तत्कायोपरि सुव्रते॥ १६४<br><br>तत्र पित्रा सुशैलेन स्थापितं त्वचलेश्वरम्।<br>अलङ्कृतं मया ब्रह्मपुरस्तान्मुनिभिः सह॥ १६५<br><br>चण्डिकेश्वरकं देवि चण्डिकेशा तवात्मजा।<br>चण्डिकानिर्मितं स्थानमम्बिकातीर्थमुत्तमम्॥ १६६<br><br>रुचिकेश्वरकं चैव धारैषा कपिला शुभा।<br>एतेषु देवि स्थानेषु तीर्थेषु विविधेषु च॥ १६७हे तीर्थज्ञे! वहाँपर स्थित मेरे व्योमलिङ्ग तीर्थको भी देखो; कदम्बेश्वर नामवाला यह तीर्थ स्कन्दके द्वारा स्थापित किया गया है। नन्द आदिके द्वारा विधिवत् स्थापित गोमण्डलेश्वरको भी देखो। हे वरानने! शोभासम्पन्न देव-ह्रद (सरोवर)-के तटपर इन्द्र आदि सभी देवताओंके द्वारा स्थापित किये गये मेरे इन स्थानोंका अवलोकन करो। हे देवि! हारपुरमें तुम्हारे हारके गिर जानेपर तुमने जगत्के हितके लिये इसे हारकुण्ड बना दिया था। हे सुव्रते! शिवरुद्रपुरमें उस पर्वतपर तुम्हारे पिता सुशैलने अचलेश्वरकी स्थापना की थी, जिसे मैंने ब्रह्मा आदि ऋषियोंके साथ सुशोभित किया था। हे देवि! तुम्हारी पुत्री चण्डिकेशाने चण्डिकेश्वरको स्थापित किया है; चण्डिकाके द्वारा स्थापित यह स्थान उत्तम अम्बिकातीर्थ है। यह रुचिकेश्वर तीर्थ है; यह पवित्र कपिलधारा [तीर्थ] है॥ १६१–१६६ १/२॥
पूजयेन्मां सदा भक्त्या मया सार्धं हि मोदते।<br>श्रीशैले सन्त्यजेद्देहं ब्राह्मणो दग्धकिल्बिषः॥ १६८<br><br>मुच्यते नात्र सन्देहो ह्यविमुक्ते यथा शुभम्।<br>महास्नानं च यः कुर्याद् घृतेन विधिनैव तु॥ १६९<br><br>स याति मम सायुज्यं स्थानेष्वेतेषु सुव्रते।<br>स्नानं पलशतं ज्ञेयमभ्यङ्गं पञ्चविंशति॥ १७०<br><br>पलानां द्वे सहस्रे तु महास्नानं प्रकीर्तितम्।<br>स्नाप्य लिङ्गं मदीयं तु गव्येनैव घृतेन च॥ १७१हे देवि! जो इन विविध स्थानों तथा तीर्थोंमें भक्तिपूर्वक सदा मेरी पूजा करता है, वह मेरे साथ आनन्द करता है। जो ब्राह्मण श्रीशैलपर शरीरत्याग करता है, वह पापरहित होकर मुक्त हो जाता है, जिस प्रकार अविमुक्तक्षेत्रमें शुभ फल होता है; इसमें सन्देह नहीं है। हे सुव्रते! जो इन स्थानोंमें विधिपूर्वक घृतसे महास्नान कराता है, वह मेरा सायुज्य प्राप्त करता है। पचीस पल [घृत]-का ‘अभ्यंग’ तथा सौ पलका ‘स्नान’ जानना चाहिये। दो हजार पलोंसे स्नान करानेको ‘महास्नान’ कहा गया है॥ १६७–१७० १/२॥
विशोध्य सर्वद्रव्यैस्तु वारिभिरभिषिञ्चति।<br>सम्मार्ज्य शतयज्ञानां स्नानेन प्रयुतं तथा॥ १७२<br><br>पूजया शतसाहस्रमनन्तं गीतवादिनाम्।<br>महास्नाने प्रसक्ते तु स्नानमष्टगुणं स्मृतम्॥ १७३<br><br>जलेन केवलेनैव गन्धतोयेन भक्तितः।<br>अनुलेपनं तु तत्सर्वं पञ्चविंशतपलेन वै॥ १७४जो मेरे लिङ्गको गायके घीसे स्नान कराकर सभी पूजाद्रव्योंसे विशुद्ध करके जलसे मेरा अभिषेक करता है—इस प्रकार मार्जन करनेसे सौ यज्ञोंका, स्नान करानेसे तथा पूजा करानेसे लाख-लाख यज्ञोंका, गीतवाद्य आदिसे अर्चन करनेपर अनन्त यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। महास्नानमें रुचि रखनेवाले भक्तोंको स्नानका आठ गुना (आठ लाख यज्ञोंका) फल बताया गया है। केवल जलसे अथवा भक्ति-