श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १२ ] अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका माहात्म्य तथा श्रीविश्वेश्वरपूजाविधिवर्णन ४८९
| शमीपुष्पं च विधिना बिल्वपत्रं च पङ्कजम्।<br>अन्यान्यपि च पुष्पाणि बिल्वपत्रं न सन्त्यजेत्॥ १७५<br><br>चतुर्द्रोणैर्महादेवमष्टद्रोणैरथापि वा।<br>दशद्रोणैस्तु नैवेद्यमष्टद्रोणैरथापि वा॥ १७६<br><br>शतद्रोणसमं पुण्यमाढकेऽपि विधीयते।<br>वित्तहीनस्य विप्रस्य नात्र कार्या विचारणा॥ १७७ | पूर्वक गन्धयुक्त जलसे अभ्यंग पचीस पलसे करना चाहिये॥ १७१–१७४॥<br><br>विधिपूर्वक शमीपुष्प, बिल्वपत्र, कमल तथा अन्य पुष्प अर्पित करना चाहिये; बिल्वपत्रका त्याग [कभी नहीं] करना चाहिये। महादेवकी पूजा चार अथवा आठ द्रोण पुष्पोंसे करनी चाहिये और दस अथवा आठ द्रोण नैवेद्य अर्पित करना चाहिये। धनहीन ब्राह्मणके लिये एक आढक नैवेद्यका पुण्य सौ द्रोण नैवेद्यके पुण्यके समान बताया गया है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये॥ १७५–१७७॥ | | भेरीमृदङ्गमुरजतिमिरापटहादिभिः ।<br>वादित्रैर्विविधैश्चान्यैर्निनादैर्विविधैरपि ॥ १७८<br><br>जागरं कारयेद्यस्तु प्रार्थयेच्च यथाक्रमम्।<br>स भृत्यपुत्रदारैश्च तथा सम्बन्धिबान्धवैः॥ १७९<br><br>सार्धं प्रदक्षिणं कृत्वा प्रार्थयेल्लिङ्गमूत्तमम्।<br>द्रव्यहीनं क्रियाहीनं श्रद्धाहीनं सुरेश्वर॥ १८०<br><br>कृतं वा न कृतं वापि क्षन्तुमर्हसि शङ्कर।<br>इत्युक्त्वा वै जपेद्रुद्रं त्वरितं शान्तिमेव च॥ १८१<br><br>जपित्वैवं महाबीजं तथा पञ्चाक्षरस्य वै।<br>स एवं सर्वतीर्थेषु सर्वयज्ञेषु यत्फलम्॥ १८२<br><br>तत्फलं समवाप्नोति वाराणस्यां यथा मृतः।<br>तथैव मम सायुज्यं लभते नात्र संशयः॥ १८३<br><br>मत्प्रियार्थमिदं कार्यं मद्भक्तैर्विधिपूर्वकम्।<br>ये न कुर्वन्ति ते भक्ता न भवन्ति न संशयः॥ १८४ | भेरी, मृदंग, मुरज, तिमिर, पटह आदि विविध वाद्य यन्त्रों और अन्य प्रकारके निनादोंके द्वारा [रात्रिमें] जो जागरण करे, उसे अपने सेवकों, पुत्रों, पत्नी, सम्बन्धियों तथा बन्धुओंके साथ प्रदक्षिणा करके उत्तम लिङ्गसे इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—'हे सुरेश्वर! हे शंकर! मैंने जो भी द्रव्यहीन, क्रियाहीन तथा श्रद्धाहीन [पूजन] किया है अथवा जो नहीं भी किया गया है, उसे आप कृपा करके क्षमा करें'—यह प्रार्थना करके त्वरित रुद्र तथा शान्तिमन्त्रका जप करना चाहिये। पंचाक्षरके महाबीजका जप करके वह सभी तीर्थोंमें जाने तथा सभी यज्ञोंको करनेसे जो फल होता है, उस फलको प्राप्त कर लेता है और वाराणसीमें मरनेपर जो सायुज्य गति होती है, मेरे उस सायुज्यको प्राप्त कर लेता है; इसमें सन्देह नहीं है। [हे देवि!] मेरे भक्तोंको चाहिये कि मेरी प्रसन्नताके लिये विधिपूर्वक यह सब करें। जो ऐसा नहीं करते, वे मेरे भक्त नहीं होते हैं; इसमें सन्देह नहीं है॥ १७८–१८४॥ | | सूत उवाच<br>निशम्य वचनं देवी गत्वा वाराणसीं पुरीम्।<br>अविमुक्तेश्वरं लिङ्गं पयसा च घृतेन च॥ १८५<br><br>अर्चयामास देवेशं रुद्रं भुवननायकम्।<br>अविमुक्ते च तपसा मन्दरस्य महात्मनः॥ १८६<br><br>कल्पयामास वै क्षेत्रं मन्दरे चारुकन्दरे।<br>तत्रान्धकं महादैत्यं हिरण्याक्षसुतं प्रभुः॥ १८७ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] यह वचन सुनकर वाराणसीपुरी जाकर देवीने दूध तथा घीसे अविमुक्तेश्वर लिङ्गको स्नान कराकर भुवननायक देवेश रुद्रका अर्चन किया और अविमुक्त [काशी]-में तपस्याके द्वारा मन्दर-पर्वतपर एक सुन्दर कन्दरामें महात्मा मन्दरका क्षेत्र निर्मित किया; वहाँ प्रभु [शिव]-ने हिरण्याक्षके |