श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ४९० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| अनुगृह्य गणत्वं च प्रापयामास लीलया।<br>एतद्वः कथितं सर्वं कथासर्वस्वमादरात्॥ १८८<br><br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि क्षेत्रमाहात्म्यमुत्तमम्।<br>सर्वक्षेत्रेषु यत्पुण्यं तत्सर्वं सहसा लभेत्॥ १८९<br><br>श्रावयेद्वा द्विजान् सर्वान् कृतशौचान् जितेन्द्रियान्।<br>स एव सर्वयज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः॥ १९० | पुत्र महादैत्य अन्धकपर अनुग्रह करके लीलापूर्वक उसे गणत्व प्राप्त कराया था। [हे ऋषियो!] इस प्रकार मैंने आप लोगोंसे आदरपूर्वक सम्पूर्ण कथासार कहा। जो मनुष्य इस क्षेत्रके उत्तम माहात्म्यको पढ़ता अथवा सुनता है, वह सभी क्षेत्रोंमें वासका जो पुण्य होता है, वह सब तत्काल प्राप्त कर लेता है अथवा जो सभी पवित्र तथा जितेन्द्रिय द्विजोंको सुनाता है, वह भी समस्त यज्ञोंका फल प्राप्त कर लेता है॥ १८५-१९०॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे वाराणसीश्रीशैलमाहात्म्यकथनं नाम द्विनवतितमोऽध्यायः॥ ९२॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'वाराणसीश्रीशैलमाहात्म्यकथन' नामक बानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९२॥
तिरानबेवाँ अध्याय
हिरण्याक्षपुत्र अन्धकासुरका आख्यान तथा शिवानुग्रहसे उसे गाणपत्यपदकी प्राप्ति
| ऋषय ऊचुः<br>अन्धको नाम दैत्येन्द्रो मन्दरे चारुकन्दरे।<br>दमितस्तु कथं लेभे गाणपत्यं महेश्वरात्॥ १<br>वक्तुमर्हसि चास्माकं यथावृत्तं यथाश्रुतम्। | ऋषिगण बोले— [हे सूतजी!] अन्धक नामक दैत्यराजने मन्दरपर्वतकी सुन्दर गुफामें दमित होकर किस प्रकार महेश्वरसे गाणपत्य (गणपतिपद) प्राप्त किया; जिस प्रकार यह घटित हुआ और जैसा आपने सुना है, वह कृपापूर्वक हम लोगोंको बताइये॥ १ १/२॥ |
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| सूत उवाच<br>अन्धकानुग्रहं चैव मन्दरे शोषणं तथा॥ २<br>वरलाभमशेषं च प्रवदामि समासतः।<br>हिरण्याक्षस्य तनयो हिरणयनयनोपमः॥ ३<br>पुरान्धक इति ख्यातस्तपसा लब्धविक्रमः।<br>प्रसादाद् ब्रह्मणः साक्षादवध्यत्वमवाप्य च॥ ४<br>त्रैलोक्यमखिलं भुक्त्वा जित्वा चेन्द्रपुरं पुरा।<br>लीलया चाप्रयत्नेन त्रासयामास वासवम्॥ ५ | सूतजी बोले— [हे ऋषियो!] मैं अन्धकपर [शिवजीके] अनुग्रह, मन्दरपर उसके दमन तथा वरप्राप्ति—यह सब संक्षेपमें बता रहा हूँ। प्राचीनकालमें हिरण्याक्षका एक पुत्र था; हिरण्याक्षके समान शक्तिशाली वह अन्धक—इस नामसे प्रसिद्ध हुआ और उसने तपस्यासे महान् पराक्रम प्राप्त कर लिया। वह साक्षात् ब्रह्माकी कृपासे [किसीसे] न मारे जानेका वर प्राप्त करके सम्पूर्ण त्रिलोकोंका उपभोग करके इन्द्रलोकको लीलापूर्वक बिना प्रयासके ही जीतकर इन्द्रको पीड़ित करने लगा॥ २-५॥ |
| बाधितास्ताडिता बद्धाः पातितास्तेन ते सुराः।<br>विविशुर्मन्दरं भीता नारायणपुरोगमाः॥ ६ | उसके द्वारा कष्ट पहुँचाये गये, पीटे गये, बाँधे गये, गिराये गये नारायण आदि वे देवता डरकर मन्दरपर्वतकी गुफामें प्रविष्ट हो गये॥ ६॥ |
| एवं सम्पीड्य वै देवानन्धकोऽपि महासुरः।<br>यदृच्छया गिरिं प्राप्तो मन्दरं चारुकन्दरम्॥ ७ | इस प्रकार देवताओंको बहुत पीड़ित करके |