श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ९३] हिरण्याक्षपुत्र अन्धकासुरका आख्यान तथा शिवानुग्रहसे उसे गाणपत्यपदकी प्राप्ति | ४९१
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| ततस्ते समस्ताः सुरेन्द्राः ससाध्याः<br>सुरेशं महेशं पुरेत्याहुरेवम्।<br>द्रुतं चाल्पवीर्यप्रभिन्नाङ्गभिन्ना<br>वयं दैत्यराजस्य शस्त्रैर्निकृत्ताः॥ ८ | महादैत्य अन्धक भी अपनी इच्छासे सुन्दर गुफावाले मन्दरपर्वतपर पहुँच गया॥ ७॥<br><br>तब साध्योंसहित वे सभी देवगण शीघ्र ही सुरेश्वर महेशके सामने पहुँचकर इस प्रकार बोले—'दैत्यराज [अन्धक]-के शस्त्रोंसे काटे गये हमलोग छिन्न-भिन्न अंगोंवाले हो गये हैं और अल्प पराक्रमवाले हो गये हैं'॥ ८॥ |
| इतीदमखिलं श्रुत्वा दैत्यागमनमौपमम्।<br>गणेश्वरैश्च भगवानन्धकाभिमुखं ययौ॥ ९ | तब दैत्यका अद्भुत आगमन-सम्बन्धी यह सब वृत्तान्त सुनकर भगवान् शिव अपने गणेश्वरोंके साथ अन्धकके समक्ष पहुँचे॥ ९॥ |
| तत्रेन्द्रपद्मोद्भवविष्णुमुख्याः<br>सुरेश्वरा विप्रवराश्च सर्वे।<br>जयेति वाचा भगवन्तमूचुः<br>किरीटबद्धाञ्जलयः समन्तात्॥ १० | उस समय इन्द्र, ब्रह्मा, विष्णु आदि प्रधान सुरेश्वर तथा श्रेष्ठ विप्र—ये सब बद्ध अञ्जलियोंको सिरसे लगाकर चारों ओरसे भगवान् शिवकी जय बोलने लगे॥ १०॥ |
| अथाशेषासुरांस्तस्य कोटिकोटिशतैस्ततः।<br>भस्मीकृत्य महादेवो निर्बिभेदान्धकं तदा॥ ११ | तब महादेवने सैकड़ों-करोड़ों सैनिकोंके साथ उस अन्धकके समस्त राक्षसोंको भस्म करके अन्धकको [अपने त्रिशूलसे] बींध डाला॥ ११॥ |
| शूलेन शूलिना प्रोतं दग्धकल्मषकञ्चुकम्।<br>दृष्ट्वान्धकं ननादेशं प्रणम्य स पितामहः॥ १२ | शिवके द्वारा त्रिशूलसे बींधे गये उस दग्धपापरूपी कंचुकवाले अन्धकको देखकर ब्रह्माजी ईश्वर (शिव)-को प्रणाम करके [प्रसन्नतासे] निनाद करने लगे॥ १२॥ |
| तन्नादश्रवणान्नेदुर्देवा देवं प्रणम्य तम्।<br>ननृतुर्मुनयः सर्वे मुमुदुर्गणपुङ्गवाः॥ १३<br><br>ससृजुः पुष्पवर्षाणि देवाः शाम्भोस्तदोपरि।<br>त्रैलोक्यमखिलं हर्षान्ननन्द च ननाद च॥ १४ | उस ध्वनिको सुनकर सभी देवता, मुनि तथा श्रेष्ठ गण भी उन्हें प्रणाम करके हर्षध्वनि करने लगे, नाचने लगे और आनन्द मनाने लगे। देवताओंने उस समय शिवजीके ऊपर पुष्पोंकी वर्षा की और सम्पूर्ण त्रैलोक्य हर्षके कारण आनन्दित हो उठा तथा ध्वनि करने लगा॥ १३-१४॥ |
| दग्धोऽग्निना च शूलेन प्रोतः प्रेत इवान्धकः।<br>सात्त्विकं भावमास्थाय चिन्तयामास चेतसा॥ १५ | प्रज्वलित अग्निवाले त्रिशूलसे बींधा हुआ प्रेततुल्य वह अन्धक सात्त्विक भावमें स्थित होकर मनमें सोचने लगा— |
| जन्मान्तरेऽपि देवेन दग्धो यस्माच्छिवेन वै।<br>आराधितो मया शम्भुः पुरा साक्षान्महेश्वरः॥ १६<br><br>तस्मादेतन्मया लब्धमन्यथा नोपपद्यते।<br>यः स्मरेन्मनसा रुद्रं प्राणान्ते सकृदेव वा॥ १७ | 'पूर्वजन्ममें भी शिवने मुझे दग्ध किया था, मैंने पहले साक्षात् महेश्वर शिवकी आराधना की थी, इसीलिये मैंने ऐसी गति प्राप्त की, अन्यथा ऐसा कभी न होता। जो [व्यक्ति] मृत्युकालके समय एक बार भी मनसे शिवका स्मरण करता है, वह शिवसायुज्य प्राप्त |
| स याति शिवसायुज्यं किं पुनर्बहुशः स्मरन्।<br>ब्रह्मा च भगवान् विष्णुः सर्वे देवाः सवासवाः॥ १८ | करता है, तो फिर जो बहुत बार स्मरण करे, उसका कहना ही क्या! ब्रह्मा, भगवान् विष्णु और इन्द्रसहित सभी |