श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ४९२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| शरणं प्राप्य तिष्ठन्ति तमेव शरणं व्रजेत्।<br>एवं सञ्चिन्त्य तुष्टात्मा सोऽन्धकश्चान्धकार्दनम्॥ १९<br><br>सगणं शिवमीशानमस्तुवत्पुण्यगौरवात्।<br>प्रार्थितस्तेन भगवान् परमार्तिहरो हरः॥ २०<br><br>हिरण्यनेत्रतनयं शूलाग्रस्थं सुरेश्वरः।<br>प्रोवाच दानवं प्रेक्ष्य घृणया नीललोहितः॥ २१<br><br>तुष्टोऽस्मि वत्स भद्रं ते कामं किं करवाणि ते।<br>वरान् वरय दैत्येन्द्र वरदोऽहं तवान्धक॥ २२<br><br>श्रुत्वा वाक्यं तदा शम्भोर्हिरण्यनयनात्मजः।<br>हर्षगद्गदया वाचा प्रोवाचेदं महेश्वरम्॥ २३<br><br>भगवन् देवदेवेश भक्तार्तिहर शङ्कर।<br>त्वयि भक्तिः प्रसीदेश यदि देयो वरश्च मे॥ २४<br><br>श्रुत्वा भवोऽपि वचनमन्धकस्य महात्मनः।<br>प्रददौ दुर्लभां श्रद्धां दैत्येन्द्राय महाद्युतिः॥ २५<br><br>गाणपत्यं च दैत्याय प्रददौ चावरोप्य तम्।<br>प्रणेमुस्तं सुरेन्द्राद्या गाणपत्ये प्रतिष्ठितम्॥ २६ | देवता उन्हींकी शरण ग्रहण करके स्थित हैं, अतः उन्हीं [शिव]-की शरणमें जाना चाहिये'॥ १५-१८<sup>१/२</sup>॥<br><br>इस प्रकार विचार करके वह अन्धक अपने पुण्यगौरवके कारण गणोंसहित अन्धकका संहार करनेवाले उन ईशान शिवकी स्तुति करने लगा। तब उसके द्वारा प्रार्थित होकर बड़े-से-बड़े दुःखका हरण करनेवाले नीललोहित सुरेश्वर भगवान् हर [अपने] त्रिशूलके अग्रभागपर स्थित हिरण्याक्षपुत्र [अन्धक]-की ओर दयापूर्वक देखकर उससे बोले—'हे वत्स! मैं [तुमपर] प्रसन्न हूँ, तुम्हारा कल्याण हो; मैं तुम्हारी कौन-सी कामना पूर्ण करूँ? हे दैत्येन्द्र! वर माँगो। हे अन्धक! मैं तुम्हें वर देनेवाला हूँ'॥ १९-२२॥<br><br>तब शम्भुका वचन सुनकर हिरण्याक्षपुत्रने हर्षके कारण गद्गद वाणीमें महेश्वरसे यह कहा—'हे भगवन्! हे देवदेवेश! भक्तोंका कष्ट हरनेवाले हे शंकर! मुझपर प्रसन्न होइये। हे ईश! यदि आप मुझे वर देना ही चाहते हैं, तो यही वर प्रदान करें कि आपमें [सदा] मेरी भक्ति हो'॥ २३-२४॥<br><br>महान् आत्मावाले अन्धकका वचन सुनकर परम कान्तिवाले शिवने [उस] दैत्येन्द्रको [अपनी] दुर्लभ भक्ति प्रदान की और उस दैत्यको त्रिशूलपरसे उतारकर उसे गणाधिप पद प्रदान किया। तब इन्द्र आदि देवताओंने गाणपत्य पदपर प्रतिष्ठित उस अन्धकको प्रणाम किया॥ २५-२६॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे अन्धकगाणपत्यात्मको नाम त्रिनवतितमोऽध्यायः ॥ ९३॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'अन्धकगाणपत्यात्मक' नामक तिरानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९३॥
चौरानबेवाँ अध्याय
भगवान्के वाराहावतारकी कथा, हिरण्याक्षका वध तथा देवताओंद्वारा भगवान् वाराहकी स्तुति
| ऋषय ऊचुः<br>कथमस्य पिता दैत्यो हिरण्याक्षः सुदारुणः।<br>विष्णुना सूदतो विष्णुर्वाराहत्वं कथं गतः॥ १<br>तस्य शृङ्गं महेशस्य भूषणत्वं कथं गतम्।<br>एतत्सर्वं विशेषेण सूत वक्तुमिहार्हसि॥ २ | ऋषिगण बोले—हे सूतजी! [भगवान्] विष्णुके द्वारा इस [अन्धक]-का पिता महाभयंकर दैत्य हिरण्याक्ष कैसे मारा गया, विष्णुने वाराहका रूप क्यों धारण किया और उनकी सींगने महेश्वरका भूषणत्व कैसे प्राप्त किया? यह सब आप विशेषरूपसे बताइये॥ १-२॥ |