श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ९४] भगवान्के वाराहावतारकी कथा, हिरण्याक्षका वध... भगवान् वराहकी स्तुति ४९३
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
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| हिरण्यकशिपोर्भ्राता हिरण्याक्ष इति स्मृतः।<br>पुरान्धकासुरेशस्य पिता कालान्तकोपमः॥ ३<br>देवाञ्जित्वाथ दैत्येन्द्रो बद्ध्वा च धरणीमिमाम्।<br>नीत्वा रसातलं चक्रे बन्दीमिन्दीवरप्रभाम्॥ ४ | —[हे ऋषियो!] हिरण्याक्ष हिरण्य-कशिपुका भाई कहा गया है। पूर्वकालमें असुरेन्द्र अन्धकके पिता दैत्येन्द्र हिरण्याक्षने, जो कालान्तकके समान था, देवताओंको जीतकर कमलके समान प्रभावृाली इस पृथ्वीको बाँधकर रसातलमें ले जाकर उसे बन्दी बना लिया॥ ३-४॥ |
| ततः सब्रह्मका देवाः परिम्लानमुखश्रियः।<br>बाधितास्ताडिता बद्धा हिरण्याक्षेण तेन वै॥ ५<br>बलिना दैत्यमुख्येन क्रूरेण सुदुरात्मना।<br>प्रणम्य शिरसा विष्णुं दैत्यकोटिविमर्दनम्॥ ६<br>सर्वे विज्ञापयामासुर्धरणीबन्धनं हरेः।<br>श्रुत्वैतद्भगवान् विष्णुर्धरणीबन्धनं हरिः॥ ७ | तदनन्तर बलशाली, क्रूर तथा अति दुरात्मा उस महादैत्य हिरण्याक्षके द्वारा सताये गये, पीटे गये तथा बाँधे गये ब्रह्मासहित मुरझाये मुखश्रीवाले सभी देवताओंने करोड़ों दैत्योंका संहार करनेवाले विष्णुको प्रणाम करके पृथ्वीके बन्धनका वृत्तान्त उन हरिको बताया॥ ५-६ १/२॥ |
| भूत्वा यज्ञवराहोऽसौ यथा लिङ्गोद्भवे तथा।<br>दैत्यैश्च सार्धं दैत्येन्द्रं हिरण्याक्षं महाबलम्॥ ८<br>दंष्ट्राग्रकोट्या हत्वैनं रेजे दैत्यान्तकृत्प्रभुः।<br>कल्पादिषु यथापूर्वं प्रविश्य च रसातलम्॥ ९<br>आनीय वसुधां देवीमङ्कस्थामकरोद् बहिः।<br>ततस्तुष्टाव देवेशं देवदेवः पितामहः॥ १० | इस पृथ्वीबन्धनको सुनकर उन भगवान् श्रीहरि विष्णुने लिङ्ग-प्रादुर्भावके समय जैसा रूप धारण किया था, वैसा ही यज्ञवराहका रूप धारणकर वे अपने दाँतोंके आगेके नुकीले भागसे [सभी] दैत्योंसहित महाबली दैत्यराज हिरण्याक्षका वध करके सुशोभित हुए। दैत्योंका अन्त करनेवाले उन प्रभुने जैसे पूर्व कल्पोंमें रसातलमें प्रवेश किया था, वैसे ही रसातलमें प्रवेश करके पृथ्वीदेवीको अपनी गोदमें रखकर वहाँसे लाकर पुनः बाहर स्थापित कर दिया॥ ७-९ १/२॥ |
| शक्राद्यैः सहितो भूत्वा हर्षगद्गदया गिरा।<br>शाश्वताय वराहाय दंष्ट्रिणे दण्डिने नमः॥ ११<br>नारायणाय सर्वाय ब्रह्मणे परमात्मने।<br>कर्त्रे धर्त्रे धरायास्तु हर्त्रे देवारिणां स्वयम्।<br>कर्त्रे नेत्रे सुरेन्द्राणां शास्त्रे च सकलस्य च॥ १२ | तत्पश्चात् देवदेव ब्रह्मा हर्षयुक्त गद्गद वाणीमें इन्द्र आदि [देवताओं]-के साथ मिलकर [उन] देवेशकी स्तुति करने लगे—शाश्वत, दंष्ट्र (दाढ़)-वाले, दण्डधारी, नारायण, सर्वमय, ब्रह्मस्वरूप, परमात्मा, पृथ्वीकी रचना तथा रक्षा करनेवाले, देवताओंके शत्रुओंका नाश करनेवाले, सुरेन्द्रोंके जनक एवं नायक और सबके नियन्ता [भगवान्] वराहको नमस्कार है॥ १०-१२॥ |
| त्वमष्टमूर्तिस्त्वमनन्तमूर्ति-<br>स्त्वमादिदेवस्त्वमनन्तवेदितः।<br>त्वया कृतं सर्वमिदं प्रसीद<br>सुरेश लोकेश वराह विष्णो॥ १३ | हे सुरेश! हे लोकेश! हे वराह! हे विष्णो! आप अष्टमूर्ति हैं, आप अनन्तमूर्ति हैं, आप आदिदेव हैं, आप सर्वज्ञ हैं; आपने ही इस सम्पूर्ण जगत्की रचना की है; आप प्रसन्न होइये॥ १३॥ |
| तथैकदंष्ट्राग्रमुखाग्रकोटि-<br>भागैकभागार्धतमेन विष्णो।<br>हताः क्षणात्कामददैत्यमुख्याः<br>स्वदंष्ट्रकोट्या सह पुत्रभृत्यैः॥ १४ | हे विष्णो! आपने एक दाढ़के अग्र भागकी कोटिके एक भागके आधे भागके बराबर अपनी दाढ़की कोटिसे ही पुत्रों तथा सेवकोंसमेत कामद आदि प्रधान दैत्योंको क्षणभरमें मार डाला॥ १४॥ |