श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग ] |
|---|---|
| ४९४ |
| श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| त्वयोद्धृता देव धरा धरेश<br>धराधराकार धृताग्रदंष्ट्रे।<br>धराधरैः सर्वजनैः समुद्रैः<br>सुरासुरैः सेवितचन्द्रवक्त्र ॥ १५ | हे देव! हे धरेश! हे पर्वताकार! हे सेवितचन्द्रवक्त्र!<br>आपने दिग्गजों, सभी प्राणियों, समुद्रों, देवताओं तथा असुरोंसहित पृथ्वीको उठा लिया और उसे अपनी दाढ़के अग्र भागपर रख लिया ॥ १५ ॥ |
| त्वयैव देवेश विभो कृतश्च<br>जयः सुराणामसुरेश्वराणाम्।<br>अहो प्रदत्तस्तु वरः प्रसीद<br>वाग्देवतावारिजसम्भवाय ॥ १६ | हे देवेश! हे विभो! आपने ही असुरोंपर देवताओंकी विजय दिलायी है। अहो, आपने ही सरस्वतीयुक्त ब्रह्माको वर दिया था; आप प्रसन्न हो जाइये ॥ १६ ॥ |
| तव रोम्णि सकलाम्रेश्वरा<br>नयनद्वये शशिरवी पदद्वये।<br>निहिता रसातलगता वसुन्धरा<br>तव पृष्ठतः सकलतारकादयः ॥ १७ | सभी देवता आपके रोममें स्थित हैं, चन्द्रमा तथा सूर्य आपके दोनों नेत्रोंमें विराजमान हैं, रसातलमें गयी हुई पृथ्वी आपके दोनों चरणोंमें निहित है, सम्पूर्ण तारे आदि आपकी पीठपर स्थित हैं ॥ १७ ॥ |
| जगतां हिताय भवता वसुन्धरा<br>भगवन् रसातलपुटं गता तदा।<br>अबलोद्धृता च भगवंस्त्वयैव<br>सकलं त्वयैव हि धृतं जगद्गुरो ॥ १८ | हे भगवन्! आपने रसातलमें गयी हुई अबला पृथ्वीका उद्धार जगत्के हितके लिये किया है। हे भगवन्! हे जगद्गुरो! आपने ही सबको धारण किया है ॥ १८ ॥ |
| इति वाक्पतिर्बहुविधैस्तवार्त्चनैः<br>प्रणिपत्य विष्णुममरैः प्रजापतिः।<br>विविधान् वरान् हरिमुखात्तु लब्धवान्<br>हरिनाभिवारिजदेहभृत्स्वयम् ॥ १९ | इस प्रकार श्रीहरिके नाभिकमलसे उत्पन्न होनेवाले प्रजापति ब्रह्माने देवताओंके साथ अनेक प्रकारके स्तुतिवचनोंसे [वाराहरूपधारी] विष्णुको प्रणाम करके उन [भगवान्] विष्णुके मुखसे अनेक वर प्राप्त किये ॥ १९ ॥ |
| अथ तामुद्धृतां तेन धरां देवा मुनीश्वराः।<br>मूर्ध्न्यारोप्य नमश्चक्रुश्चक्रिणः सन्निधौ तदा ॥ २० | इसके बाद सभी देवताओं तथा मुनीश्वरोंनै उन विष्णुके द्वारा लायी गयी पृथ्वीको [अपने] सिरसे |