भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 497, कुल 834 में से

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पृष्ठ 497

अध्याय ९४] भगवान्‌के वाराहावतारकी कथा, हिरण्याक्षका वध... भगवान् वराहकी स्तुति | ४९५


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अनेनैव वराहेण चोद्धृतासि वरप्रदे।<br>कृष्णेनाक्लिष्टकार्येण शतहस्तेन विष्णुना॥ २१<br><br>धरणि त्वं महाभोगे भूमिस्त्वं धेनुरव्यये।<br>लोकानां धारणी त्वं हि मृत्तिके हर पातकम्॥ २२<br><br>मनसा कर्मणा वाचा वरदे वारिजेक्षणे।<br>त्वया हतेन पापेन जीवामस्त्वत्प्रसादतः॥ २३लगाकर चक्रधारी विष्णुके सामने ही उसे नमस्कार किया। [वे बोले—] हे वरप्रदे! सहज क्रिया-कलापोंवाले तथा सैकड़ों हाथोंवाले वाराहरूपधारी इन विष्णुने ही आपका उद्धार किया है। हे धरणि! हे महाभोगे! आप भूमि हैं। हे अव्यये! आप धेनु हैं। हे मृत्तिके! आप लोकोंको धारण करनेवाली हैं; [हमारे] पापको दूर कीजिये। हे वरदे! हे कमलनयने! हमलोगोंद्वारा मन-वचन-कर्मसे किये गये पाप आपके द्वारा नष्ट किये जानेपर ही हमलोग आपकी कृपासे जीते हैं॥ २०–२३॥
इत्युक्ता सा तदा देवी धरा देवैरथाब्रवीत्।<br>वराहदंष्ट्राभिन्नायां धरायां मृत्तिकां द्विजाः॥ २४<br><br>मन्त्रेणानेन योऽबिभ्रत् मूर्ध्नि पापात्प्रमुच्यते।<br>आयुष्मान् बलवान् धन्यः पुत्रपौत्रसमन्वितः॥ २५<br><br>क्रमाद्भुवि दिवं प्राप्य कर्मान्ते मोदते सुरैः।देवताओंके द्वारा ऐसा कहे जानेपर उन पृथ्वीदेवीने कहा—'हे द्विजो! जो [व्यक्ति] वराहके दंष्ट्रासे खोदी गयी पृथ्वीकी मिट्टीको [पूर्वोक्त] इस मन्त्रसे अपने सिरपर धारण करता है, वह पापसे मुक्त हो जाता है; वह क्रमसे पृथ्वीलोकमें दीर्घजीवी, बलवान्, धन्य और पुत्र-पौत्रसे युक्त होता है, पुनः प्रारब्ध कर्मके क्षीण होनेपर स्वर्ग प्राप्त करके देवताओंके साथ आनन्द मनाता है'॥ २४-२५ १/२॥
अथ देवे गते त्यक्त्वा वराहे क्षीरसागरम्॥ २६<br><br>वाराहरूपमनघं चचाल च धरा पुनः।<br>तस्य दंष्ट्राभराक्रान्ता देवदेवस्य धीमतः॥ २७<br><br>यदृच्छया भवः पश्यन् जगाम जगदीश्वरः।<br>दंष्ट्रां जग्राह दृष्ट्वा तां भूषणार्थमथात्मनः॥ २८<br><br>दधार च महादेवः कूर्चान्ते वै महोरसि।इसके बाद निष्पाप वाराहरूपको त्यागकर भगवान् वराहके क्षीरसागर चले जानेपर उन बुद्धिमान् देवदेवके दाढ़ोंके भारसे आक्रान्त पृथ्वी एक बार पुनः हिल गयी। संयोगवश यह सब देखते हुए जगत्के स्वामी शिव वहाँ पहुँच गये और उन्होंने उस दंष्ट्राको देखकर उसे अपने भूषणके लिये ग्रहण कर लिया। महादेवने उसे अपने श्मश्रु (दाढ़ी)-के केशके समीप विशाल वक्षःस्थलपर धारण कर लिया॥ २६–२८ १/२॥
देवाश्च तुष्टुवुः सेन्द्रा देवदेवस्य वैभवम्॥ २९<br><br>धरा प्रतिष्ठिता ह्येवं देवदेवेन लीलया।<br>भूतानां सम्प्लवे चापि विष्णोश्चैव कलेवरम्॥ ३०<br><br>ब्रह्मणश्च तथान्येषां देवानापि लीलया।<br>विभुरङ्गविभागेन भूषितो न यदि प्रभुः॥ ३१<br><br>कथं विमुक्तिर्विप्राणां तस्माद्दंष्ट्री महेश्वरः॥ ३२तब इन्द्रसहित सभी देवगण देवदेव [शिव]-के ऐश्वर्यकी स्तुति करने लगे। इस प्रकार देवदेवने लीलापूर्वक पृथ्वीको प्रतिष्ठित किया। महाप्रलयकालमें भी विष्णु, ब्रह्मा तथा अन्य देवताओंके कलेवरको देखकर यदि सर्वव्यापक प्रभु [शिव] भक्तवात्सल्यके कारण [विष्णुके] अंगके अंश [उस द्रंष्ट्रा]-से विभूषित न होते, तो विप्रोंकी मुक्ति कैसे होती; अतः महेश्वर दंष्ट्री हैं॥ २९–३२॥

॥ इति श्रीमल्लिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे वाराहप्रादुर्भावो नाम चतुर्नवतितमोऽध्यायः ॥ ९४ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'वाराहप्रादुर्भाव' नामक चौरानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९४॥

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