श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ४९६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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पंचानबेवाँ अध्याय
नृसिंहावतारके सन्दर्भमें भक्त प्रह्लादकी कथा, हिरण्यकशिपुका वध, भगवान् नृसिंहके उग्ररूपको देखकर देवताओंका भयभीत होकर भगवान् महेश्वरकी स्तुति करना, महेश्वरके शरभावतारका प्राकट्य
| संस्कृत | हिन्दी |
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| ऋषय ऊचुः<br>नृसिंहेन हतः पूर्वं हिरण्याक्षाग्रजः श्रुतम्।<br>कथं निष्षूदितस्तेन हिरण्यकशिपुर्वद॥ १ | ऋषिगण बोले— [हे सूतजी!] यह सुना गया है कि पूर्वकालमें हिरण्याक्षका ज्येष्ठ भ्राता हिरण्यकशिपु भगवान् नृसिंहद्वारा मारा गया था; आप [हमलोगोंको] बतायें कि उनके द्वारा उसका वध कैसे किया गया?॥ १॥ |
| सूत उवाच<br>हिरण्यकशिपोः पुत्रः प्रह्लाद इति विश्रुतः।<br>धर्मज्ञः सत्यसम्पन्नस्तपस्वी चाभवत्सुधीः॥ २<br><br>जन्मप्रभृति देवेशं पूजयामास चाव्ययम्।<br>सर्वज्ञं सर्वगं विष्णुं सर्वदेवभवोद्भवम्॥ ३<br><br>तमादिपुरुषं भक्त्या परब्रह्मस्वरूपिणम्।<br>ब्रह्मणोऽधिपतिं सृष्टिस्थितिसंहारकारणम्॥ ४ | सूतजी बोले— हिरण्यकशिपुका पुत्र 'प्रह्लाद' इस नामसे विख्यात था। वह धर्मज्ञ, सत्यनिष्ठ, तपस्वी तथा बुद्धिमान् था। वह जन्मसे ही अविनाशी, सर्वज्ञ, सभी देवताओंकी उत्पत्तिके कारणस्वरूप, आदिपुरुष, परब्रह्मरूप, ब्रह्माके अधिपति और सृष्टि-पालन-संहार करनेवाले उन देवेश्वर विष्णुकी भक्तिपूर्वक पूजा करता था॥ २-४॥ |
| सोऽपि विष्णोस्तथाभूतं दृष्ट्वा पुत्रं समाहितम्।<br>नमो नारायणायेति गोविन्देति मुहुर्मुहुः॥ ५<br><br>स्तुवन्तं प्राह दैवारिः प्रहसन्निव पापधीः।<br>न मां जानासि दुर्बुद्धे सर्वदैत्यामरेश्वरम्॥ ६<br><br>प्रह्लाद वीर दुष्पुत्र द्विजदेवार्तिकारणम्।<br>को विष्णुः पद्मजो वापि शक्रश्च वरुणोऽथ वा॥ ७<br><br>वायुः सोमस्तथेशानः पावको मम यः समः।<br>मामेवार्चय भक्त्या च त्यक्त्वा नारायणं सदा॥ ८<br><br>प्रह्लाद जीविते वाञ्छा तवैषा शृणु चास्ति चेत्।<br>श्रुत्वापि तस्य वचनं हिरण्यकशिपोः सुधीः॥ ९ | अपने पुत्रको एकाग्रचित्त होकर विष्णुकी उस प्रकारकी भक्तिमें तत्पर और बार-बार 'नमो नारायणाय, नमो गोविन्दाय'—इस प्रकार स्तुति करते हुए देखकर उस पापबुद्धि तथा देवशत्रु हिरण्यकशिपुने हँसते हुए कहा—हे दुर्बुद्धे! हे प्रह्लाद! हे वीर! हे दुष्पुत्र! सभी दैत्यों तथा देवताओंके स्वामी और ब्राह्मणों तथा देवताओंको दुःख देनेवाले मुझ [हिरण्यकशिपु]-को नहीं जानते हो। विष्णु, ब्रह्मा, इन्द्र, वरुण, वायु, चन्द्र, ईशान अथवा अग्नि—इनमें ऐसा कौन है, जो मेरे समान है; अतः तुम नारायणको पूर्णरूपसे छोड़कर सदा भक्तिपूर्वक मेरी ही पूजा करो। हे प्रह्लाद! यदि जीवित रहनेकी तुम्हारी इच्छा हो, तो [ध्यान देकर] इस बातको सुन लो॥ ५-८ १/२॥ |
| प्रह्लादः पूजयामास नमो नारायणेति च।<br>नमो नारायणायेति सर्वदैत्यकुमारकान्॥ १०<br><br>अध्यापयामास च तां ब्रह्मविद्यां सुशोभनाम्।<br>दुर्लङ्घ्यां चात्मनो दृष्ट्वा शक्रादिभिरपि स्वयम्॥ ११ | उस हिरण्यकशिपुका वचन सुनकर भी बुद्धिमान् प्रह्लाद [विष्णुकी] पूजा करता रहा और 'नमो नारायणाय, नमो नारायणाय'—ऐसा उच्चारण करता रहा। उसने सभी दैत्यकुमारोंको [नारदोपदिष्ट] वह उत्तम ब्रह्मविद्या भी सिखायी। तब इन्द्र आदिके द्वारा भी दुर्लंघ्य अपनी |