श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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अध्याय १५] नृसिंहावतारके सन्दर्भमें भक्त प्रह्लादकी कथा...महेश्वरके शरभावतारका प्राकट्य ४९७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पुत्रेण लङ्घितामाज्ञां हिरण्यः प्राह दानवान्।<br>एतं नानाविधैर्वध्यं दुष्पुत्रं हन्तुमर्हथ ॥ १२ | आज्ञाको स्वयं अपने पुत्रके द्वारा उल्लंघित देखकर हिरण्यकशिपुने दानवोंसे कहा—इस वधयोग्य कुपुत्रको अनेकविध उपायोंसे मार डालो ॥ ९–१२ ॥ |
| एवमुक्तास्तदा तेन दैत्येन सुदुरात्मना।<br>निजघ्नुर्देवदेवस्य भृत्यं प्रह्लादमव्ययम् ॥ १३ | तब उस दुरात्मा दैत्यके कहनेपर वे दानव देवदेव [विष्णु]-के नाशरहित भक्त प्रह्लादको मारने लगे ॥ १३ ॥ |
| तत्र तत्प्रतिकृतं तदा सुरै-<br>दैत्यराजतनयं द्विजोत्तमाः।<br>क्षीरवारिनिधिशायिनः प्रभो-<br>र्निष्फलं त्वथ बभूव तेजसा ॥ १४ | हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! उस समय असुरोंके द्वारा दैत्यराज [हिरण्यकशिपु]-के पुत्रके प्रति किया गया समस्त उपाय क्षीरसागरमें शयन करनेवाले विष्णुके तेजसे निष्फल (व्यर्थ) हो गया ॥ १४ ॥ |
| तदाथ गर्वभिन्नस्य हिरण्यकशिपोः प्रभुः।<br>तत्रैवाविरभूद्धन्तुं नृसिंहाकृतिमास्थितः ॥ १५ | तत्पश्चात् अभिमानके मदमें चूर हिरण्यकशिपुका वध करनेके लिये विष्णुजी नृसिंहरूप धारण करके वहींपर प्रकट हुए और उन्होंने पुत्र [प्रह्लाद]-की ओर देखकर उसके पिता दानवाधम हिरण्यकशिपुका वध कर दिया। उन्होंने उसी क्षण अपने तीक्ष्ण सैकड़ों नाखूनोंसे उसे विदीर्ण कर दिया। इसके बाद पापोंका नाश करनेवाले वे विष्णु बान्धवोंसहित उस दैत्यका वध करके पुनः उस दैत्येन्द्रको पीसने लगे; वे उस समय प्रलयकालीन दूसरी अग्निके समान प्रतीत हो रहे थे। हे सुव्रतो! हे विप्रो! उस समय ब्रह्मलोकपर्यन्त |
| जघान च सुतं प्रेक्ष्य पितरं दानवाधमम्।<br>बिभेद तत्क्षणादेव करजैर्निशितैः शतैः ॥ १६ | |
| ततो निहत्य तं दैत्यं सबान्धवमघापहः।<br>पीडयामास दैत्येन्द्रं युगान्ताग्निरिवापरः ॥ १७ | |
| नादैस्तस्य नृसिंहस्य घोरैर्वित्रासितं जगत्।<br>आब्रह्मभुवनाद्विप्राः प्रचचाल च सुव्रताः ॥ १८ |