भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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४९८ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सम्पूर्ण जगत् उन नृसिंहके गर्जनसे भयभीत हो गया और काँपने लगा॥ १५-१८॥
दृष्ट्वा सुरासुरमहोरगसिद्धसाध्या-<br>स्तस्मिन् क्षणे हरिविरिञ्चिमुखा नृसिंहम्।<br>धैर्यं बलं च समवाप्य ययुर्विसृज्य<br>आदिङ्मुखान्तमसुरक्षणतत्पराश्च ॥ १९उस समय नृसिंहको देखकर अपने प्राणकी रक्षामें तत्पर सभी देवता, दानव, नाग, सिद्ध, साध्य, ब्रह्मा-विष्णु आदि भी किसी तरह धैर्य तथा बल धारणकर उस स्थानको छोड़कर सभी दिशाओंमें भाग गये॥ १९॥
ततस्तैर्गतेः सैष देवो नृसिंहः<br>सहस्राकृतिः सर्वपातसर्वबाहुः।<br>सहस्रेक्षणः सोमसूर्याग्निनेत्र-<br>स्तदा संस्थितः सर्वमावृत्य मायी॥ २०तदनन्तर उनके चले जानेपर मायामय ये भगवान् नृसिंह हजाररूपवाले, सभी ओर पैरोंवाले, सभी ओर भुजाओंवाले, हजार नेत्रोंवाले, चन्द्र-सूर्य-अग्निरूप नेत्रोंवाले होकर सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको व्याप्त करके स्थित हो गये॥ २०॥
तं तुष्टुवुः सुरश्रेष्ठा लोकालोकाचले स्थिताः।<br>सब्रह्मकाः ससाध्याश्च सयमाः समरुद्गणाः ॥ २१तब लोकालोक [मर्यादा] पर्वतपर एकत्र हुए श्रेष्ठ देवता ब्रह्मा, साध्यगण, यम तथा मरुद्गणोंके साथ उनकी स्तुति करने लगे—
परात्परतरं ब्रह्म तत्त्वात्तत्त्वतमं भवान्।<br>ज्योतिषां तु परं ज्योतिः परमात्मा जगन्मयः ॥ २२आप परसे भी परतर ब्रह्म हैं, तत्त्वसे भी तत्त्वतम हैं, नक्षत्रोंकी परम ज्योति हैं, परमात्मा हैं, जगन्मय हैं,
स्थूलं सूक्ष्मं सुसूक्ष्मं च शब्दब्रह्ममयः शुभः।<br>वागतीतो निरालम्बो निर्द्वन्द्वो निरुपप्लवः ॥ २३स्थूल-सूक्ष्म तथा अत्यन्त सूक्ष्म हैं, शब्दब्रह्ममय हैं, परम पवित्र हैं, वाणीसे परे हैं, आश्रयरहित हैं, [सुख-दुःख, राग-द्वेष आदि] द्वन्द्वोंसे रहित हैं और उपद्रवशून्य हैं।
यज्ञभुग्यज्ञमूर्तिस्त्वं यज्ञिनां फलदः प्रभुः।<br>भवान् मत्स्याकृतिः कौर्ममास्थाय जगति स्थितः ॥ २४आप प्रभु यज्ञभोक्ता हैं, आप यज्ञकी मूर्ति हैं, आप यज्ञकर्ताओंको फल प्रदान करनेवाले हैं, आपने मत्स्यरूप धारण किया, आप कूर्म (कच्छप)-का रूप धारण करके जगत्में स्थित हैं।
वाराहीं चैव तां सैंहीमास्थायेह व्यवस्थितः।<br>देवानां देवरक्षार्थं निहत्य दितिजेश्वरम् ॥ २५देवताओंकी रक्षाके लिये वाराह तथा नृसिंहका रूप धारणकर दैत्येन्द्रका वध करके आप इस लोकमें प्रतिष्ठित हुए।
द्विजशापच्छलेनैवमवतीर्णोऽसि लीलया।<br>न दृष्टं यत्त्वदन्यं हि भवान् सर्वं चराचरम् ॥ २६इसी प्रकार भृगुमुनिके शापके बहाने अपनी लीलासे आपने अवतार ग्रहण किया। आपसे पृथक् अन्य कुछ भी नहीं देखा गया है; आप चर-अचर सब कुछ हैं।
भवान् विष्णुर्भवान् रुद्रो भवानेव पितामहः।<br>भवानादिर्भवानन्तो भवानेव वयं विभो ॥ २७हे विभो! आप ही विष्णु हैं, आप ही रुद्र हैं, आप ही ब्रह्मा हैं, आप ही आदि हैं, आप ही अन्त हैं और आप ही हम सब हैं।
भवानेव जगत्सर्वं प्रलापेन किमीश्वर।<br>मायया बहुधा संस्थमद्वितीयमयं प्रभो ॥ २८आप [स्वयं] सम्पूर्ण जगत् हैं; हे ईश्वर! अधिक कहनेसे क्या प्रयोजन? हे प्रभो! अद्वितीय (एक) होते हुए भी [अपनी] मायासे अनेक रूपोंमें स्थित आप [प्रभु]-