श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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अध्याय ९५] नृसिंहावतारके सन्दर्भमें भक्त प्रह्लादकी कथा...महेश्वरके शरभावतारका प्राकट्य ४९१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स्तोष्यामस्त्वां कथं भासि देवदेव मृगाधिप।<br>स्तुतोऽपि विविधैः स्तुत्यैर्भावैर्नानाविधैः प्रभुः॥ २९ | की स्तुति हम लोग कैसे करें? हे देवदेव! हे नृसिंह! आप बहुत देदीप्यमान हो रहे हैं॥ २१–२८¹/२॥ |
| न जगाम द्विजाः शान्तिं मानयन् योनिमात्मनः।<br>यो नृसिंहस्तवं भक्त्या पठेद्धार्थं विचारयेत्॥ ३०<br><br>श्रावयेद्वा द्विजान् सर्वान् विष्णुलोके महीयते।<br>तदन्तरे शिवं देवाः सेन्द्राः सब्रह्मकाः प्रभुम्॥ ३१ | हे द्विजो! विविध भावोंसे युक्त नानाविध स्तुतियोंसे प्रार्थना किये जानेपर भी वे प्रभु अपने सिंहरूपका सम्मान करते हुए शान्त नहीं हुए। जो नृसिंह-स्तुतिको भक्तिपूर्वक पढ़ता है अथवा इसके अर्थका चिन्तन करता है अथवा सभी द्विजोंने सुनाता है, वह विष्णुलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥ २९–३०¹/२॥ |
| सम्प्राप्य तुष्टुवुः सर्वं विज्ञाप्य मृगरूपिणः।<br>ततो ब्रह्मादयस्तूर्णं संस्तूय परमेश्वरम्॥ ३२<br><br>आत्मत्राणाय शरणं जग्मुः परमकारणम्।<br>मन्दरस्थं महादेवं क्रीडमानं सहोमया॥ ३३<br><br>सेवितं गणगन्धर्वैः सिद्धैरप्सरसां गणैः।<br>देवताभिः सह ब्रह्मा भीतभीतः सगद्गदम्।<br>प्रणम्य दण्डवद्भूतौ तुष्टाव परमेश्वरम्॥ ३४ | तत्पश्चात् इन्द्र तथा ब्रह्मसहित सभी देवता प्रभु शिवका ध्यान करके नृसंहरूपधारी विष्णुके विषयमें सब कुछ कहकर उनकी स्तुति करने लगे। तदनन्तर परमेश्वरकी स्तुति करके ब्रह्मा आदि [देवता] अपनी रक्षाके लिये मन्दर पर्वतपर स्थित, उमाके साथ विहार करते हुए और गन्धर्वों, सिद्धों-अप्सराओंसे सेवित परमकारण महादेवकी शरणमें गये। भयभीत ब्रह्माजी देवताओंके साथ दण्डकी भाँति पृथ्वीपर गिरकर गद्गद वाणीमें परमेश्वरकी स्तुति करने लगे॥ ३१–३४॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>नमस्ते कालकालाय नमस्ते रुद्र मन्यवे।<br>नमः शिवाय रुद्राय शङ्कराय शिवाय ते॥ ३५<br><br>उग्रोऽसि सर्वभूतानां नियन्तासि शिवोऽसि नः।<br>नमः शिवाय शर्वाय शङ्करायार्तिहारिणे॥ ३६ | ब्रह्माजी बोले—[हे शिव!] आप कालान्तकको नमस्कार है। हे रुद्र! आप क्रोधरूपको नमस्कार है। आप मोक्षरूप रुद्र, शंकर तथा शिवको नमस्कार है। आप उग्र हैं, सभी प्राणियोंके नियन्ता हैं और हम भक्तोंके लिये कल्याणकारक हैं। दुःखका नाश करनेवाले शिव, शर्व तथा शंकरको नमस्कार है॥ ३५–३६॥ |
| मयस्कराय विश्वाय विष्णवे ब्रह्मणे नमः।<br>अन्तकाय नमस्तुभ्यमुमायाः पतये नमः॥ ३७<br><br>हिरण्यबाहवे साक्षाद्धिरण्यरूपतये नमः।<br>शर्वाय सर्वरूपाय पुरुषाय नमो नमः॥ ३८<br><br>सदसद्व्यक्तिहीनाय महतः कारणाय ते।<br>नित्याय विश्वरूपाय जायमानाय ते नमः॥ ३९<br><br>जाताय बहुधा लोके प्रभूताय नमो नमः।<br>रुद्राय नीलरुद्राय कद्रुद्राय प्रचेतसे॥ ४० | आप सुखकर, विश्वरूप, विष्णु, ब्रह्माको नमस्कार है। आप अन्तक (संहारकर्ता)-को नमस्कार है; उमापतिको नमस्कार है। सुवर्णमय बाहुवाले तथा साक्षात् हिरण्यपतिको बार-बार नमस्कार है; शर्व, सर्वरूप तथा पुरुषको बार-बार नमस्कार है। सत्-असत्रूपसे रहित और महत्तत्त्वके उत्पादक आपको नमस्कार है; आप नित्य, विश्वरूप तथा उत्पन्न होनेवालेको नमस्कार है। संसारमें अनेक रूपोंमें अवतार लेनेवाले और प्रभूतको नमस्कार है; आप रुद्र, नीलरुद्र, कद्रुद्र नामक मन्त्ररूप तथा प्रचेताको नमस्कार है॥ ३७–४०॥ |