श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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५०० श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग
| श्लोक | अर्थ |
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| कालाय कालरूपाय नमः कालाङ्गहारिणे।<br>मीढुष्टमाय देवाय शितिकण्ठाय ते नमः॥ ४१<br><br>महीयसे नमस्तुभ्यं हन्त्रे देवारिणां सदा।<br>ताराय च सुताराय तारणाय नमो नमः॥ ४२<br><br>हरिकेशाय देवाय शम्भवे परमात्मने।<br>देवानां शम्भवे तुभ्यं भूतानां शम्भवे नमः॥ ४३ | आप काल तथा कालरूपको नमस्कार है; आप कालविनाशक, मीढुष्टम तथा भगवान् शितिकण्ठको नमस्कार है। आप महान्को तथा सदा देवशत्रुओंके संहार-कर्ताको नमस्कार है; तार (प्रणवरूप), सुतार तथा उद्धारकर्ताको नमस्कार है। हरितवर्णके केशवाले, परमात्मस्वरूप, देवताओंके कल्याणकारक तथा [समस्त] प्राणियोंके कल्याणकारक आप भगवान् शम्भुको नमस्कार है॥ ४१-४३॥ |
| शम्भवे हैमवत्याश्च मन्यवे रुद्ररूपिणे।<br>कपर्दिने नमस्तुभ्यं कालकण्ठाय ते नमः॥ ४४<br><br>हिरण्याय महेशाय श्रीकण्ठाय नमो नमः।<br>भस्मदिग्धशरीराय दण्डमुण्डीश्वराय च॥ ४५<br><br>नमो ह्रस्वाय दीर्घाय वामनाय नमो नमः।<br>नम उग्रत्रिशूलाय उग्राय च नमो नमः॥ ४६<br><br>भीमाय भीमरूपाय भीमकर्मरताय ते।<br>अग्रेवधाय वै भूत्वा नमो दूरेवधाय च॥ ४७ | आप पार्वतीके कल्याणकारक, यज्ञरूप, रुद्ररूप तथा कपर्दीको नमस्कार है; आप कालकण्ठको नमस्कार है। सुवर्णमय वर्णवाले महेशको तथा श्रीकण्ठको नमस्कार है। भस्मसे लिप्त शरीरवाले तथा दण्ड मुण्डीश्वरको नमस्कार है। ह्रस्व (लघु), दीर्घ तथा वामनको नमस्कार है। भयानक त्रिशूल धारण करनेवाले तथा उग्र स्वभाववालेको बार-बार नमस्कार है। आप भयंकर स्वरूपवाले तथा भयानक कर्ममें रत रहनेवाले भीमको नमस्कार है। सबसे आगे होकर [शत्रुओंका] वध करनेवाले और दूर स्थानसे भी वध करनेवाले [शिव]-को नमस्कार है॥ ४४-४७॥ |
| धन्विने शूलिने तुभ्यं गदिने हलिने नमः।<br>चक्रिणे वर्मिणे नित्यं दैत्यानां कर्मभेदिने॥ ४८<br><br>सद्याय सद्यरूपाय सद्योजाताय ते नमः।<br>वामाय वामरूपाय वामनेत्राय ते नमः॥ ४९<br><br>अघोररूपाय विकटाय विकटशरीराय ते नमः।<br>पुरुषरूपाय पुरुषैकतत्पुरुषाय वै नमः॥ ५०<br><br>पुरुषार्थप्रदानाय पतये परमेष्ठिने।<br>ईशानाय नमस्तुभ्यमीश्वराय नमो नमः॥ ५१<br><br>ब्रह्मणे ब्रह्मरूपाय नमः साक्षाच्छिवाय ते। | आप धनुर्धारी, शूलधारी, गदाधारी, हलधारी, चक्रधारी, कवचधारी तथा [गजाननरूपसे] सदा दैत्योंके कर्मका नाश करनेवाले [शिव]-को नमस्कार है। आप सद्यमन्त्ररूप, सद्यरूप, सद्योजात अवतार स्वरूपको नमस्कार है। वाम-मन्त्ररूप, सुन्दररूपवाले तथा सुन्दर नेत्रवाले आप [शिव]-को नमस्कार है। अघोरमन्त्ररूप, विकट रूपवाले तथा विकट शरीरवाले आप [शिव]-को नमस्कार है। पुरुषरूपवाले तथा पुरुषोंमें एकमात्र तत्पुरुष (उत्तम पुरुष) आपको नमस्कार है। पुरुषार्थ प्रदान करनेवाले, सबके स्वामी, परमेष्ठी तथा ईशानमन्त्ररूप आप शिवको नमस्कार है। आप ईश्वरको बार-बार नमस्कार है। ब्रह्मरूपवाले तथा साक्षात् सगुण शिवरूपवाले आप ब्रह्मको नमस्कार है॥ ४८-५१ १/२॥ |
| सर्वविष्णुर्नृसिंहस्य रूपमास्थाय विश्वकृत्॥ ५२ | विश्वकी सृष्टि करनेवाले तथा सर्वरूप प्रभु विष्णु नृसिंहका रूप धारण करके जगत्के कल्याणके |