भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 503

अध्याय ९५ ] नृसिंहावतारके सन्दर्भमें भक्त प्रह्लादकी कथा...महेश्वरके शरभावतारका प्राकट्य ५०१


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
हिरण्यकशिपुं हत्वा करजैर्निशितैः स्वयम्।<br>दैत्येन्द्रैर्बहुभिः सार्धं हितार्थं जगतां प्रभुः॥ ५३<br><br>सैंहीं समानयन् योनिं बाधते निखिलं जगत्।<br>यत्कृत्यमत्र देवेश तत्कुरुष्व भवानिह॥ ५४लिये अनेक प्रमुख दैत्योंसहित हिरण्यकशिपुको अपने तीक्ष्ण नखोंसे स्वयं मारकर सिंहरूपका सम्मान करते हुए सम्पूर्ण जगत्‌को सन्तस्त कर रहे हैं; हे देवेश! अब इस विषयमें जो उचित कार्य हो, उसे आप करें॥ ५२–५४॥
उग्रोऽसि सर्वदुष्टानां नियन्तासि शिवोऽसि नः।<br>कालकूटादिवपुषा त्राहि नः शरणागतान्॥ ५५<br><br>शुक्रं तु वृत्तं विश्वेश क्रीडा वै केवलं वयम्।<br>तवोन्मेषनिमेषाभ्यामस्माकं प्रलयोदयौ॥ ५६<br><br>उन्मीलये त्वयि ब्रह्मन् विनाशोऽस्ति न ते शिव।<br>सन्तप्ताः स्मो वयं देव हरिणामिततेजसा॥ ५७<br><br>सर्वलोकहितायैनं तत्त्वं संहर्तुमिच्छसि।आप उग्र हैं, सभी दुष्टोंको नियन्त्रणमें रखनेवाले हैं और हम लोगोंके लिये कल्याणकारक हैं। कालकूट आदि शरीरसे हम शरणागतोंकी रक्षा कीजिये। हे विश्वेश! आपका आचरण शुद्ध है और हम लोग आपके क्रीड़ामात्र हैं। आपके उन्मेष तथा निमेषसे हम लोगोंके प्रलय तथा उदय होते हैं। हे ब्रह्मन्! हे शिव! आपके उन्मीलन करनेपर भी आपका विनाश नहीं होता है। हे देव! अमित तेजवाले नृसिंहरूपधारी विष्णुके द्वारा हमलोग सन्तप्त हो रहे हैं; अतः सभी लोकोंके हितके लिये आप इस [नृसिंहरूप]–को समाप्त करनेका विचार करें॥ ५५–५७१/२॥
सूत उवाच<br>विज्ञापितस्तथा देवः प्रहसन् प्राह तान् सुरान्॥ ५८<br><br>अभयं च ददौ तेषां हनिष्यामीति तं प्रभुः।<br>सोऽपि शक्रः सुरैः सार्धं प्रणिपत्य यथागतम्॥ ५९सूतजी बोले— इस प्रकार प्रार्थना किये जानेपर प्रभु महादेवने उन देवताओंको अभयदान दिया और मुसकराते हुए उनसे कहा—'मैं उनका संहार करूँगा।' इसके बाद शिवको प्रणाम करके इन्द्र सभी देवताओंके साथ जैसे आये थे, वैसे ही चले गये और भगवान् ब्रह्मा तथा अन्य श्रेष्ठ देवता भी चले गये॥ ५८-५९१/२॥
जगाम भगवान् ब्रह्मा तथान्ये च सुरोत्तमाः।<br>अथोत्थाय महादेवः शारभं रूपमास्थितः॥ ६०<br><br>ययौ प्रान्ते नृसिंहस्य गर्वितस्य मृगाशिनः।<br>अपहृत्य तदा प्राणान् शरभः सुरपूजितः॥ ६१<br><br>सिंहात्ततो नरो भूत्वा जगाम च यथाक्रमम्।<br>एवं स्तुतस्तदा देवैर्जगाम स यथाक्रमम्॥ ६२तदनन्तर [वहाँसे] उठकर शरभका रूप धारणकर महादेवजी असुरभक्षक गर्वयुक्त नृसिंहके पास पहुँचे। तब प्राणोंका हरण करके वे शरभरूपधारी शिव देवताओंद्वारा पूजित हुए। तत्पश्चात् नृसिंहरूपसे मानवरूप होकर वे विष्णु [वहाँसे] चले गये। इस प्रकार उस समय देवताओंसे स्तुत होकर शिवजी भी [अपने स्थानको] चले गये॥ ६०–६२॥
यः पठेच्छृणुयाद्वापि संस्तवं शार्वमुत्तमम्।<br>रुद्रलोकमनुप्राप्य रुद्रेण सह मोदते॥ ६३जो [व्यक्ति] शिवजीकी इस उत्तम स्तुतिको पढ़ता अथवा सुनता है, वह रुद्रलोक प्राप्त करके [भगवान्] रुद्रके साथ आनन्दित रहता है॥ ६३॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे नृसिंहलीलावर्णनं नाम पञ्चनवतितमोऽध्यायः॥ ९५॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'नृसिंहलीलावर्णन' नामक पंचानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९५॥