भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 504
५०२श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

छानबेवाँ अध्याय

भगवान् महेश्वरद्वारा वीरभद्रका आवाहन और नृसिंहके तेजको शमन करनेके लिये भेजना, वीरभद्र तथा नृसिंहका संवाद, भगवान् शिवका शरभावतार धारणकर नृसिंहतेजको शान्त करना एवं नृसिंहद्वारा शिवस्तुति

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ऋषय ऊचुः<br>कथं देवो महादेवो विश्वसंहारकारकः।<br>शरभाख्यं महाघोरं विकृतं रूपमास्थितः ॥ १<br>किं किं धैर्यं कृतं तेन ब्रूहि सर्वमशेषतः।ऋषिगण बोले— [हे सूतजी!] विश्वका संहार करनेवाले भगवान् महादेवने अत्यन्त भयंकर तथा विकृत शरभनामक रूप कैसे धारण किया और उन्होंने कौन-सा साहसपूर्ण कृत्य किया; यह सब पूर्णरूपसे बताइये ॥ १ १/२ ॥
सूत उवाच<br>एवमभ्यर्थितो देवैर्मतिं चक्रे कृपालयः॥ २<br>यत्तेजस्तु नृसिंहाख्यं संहर्तुं परमेश्वरः।<br>तदर्थं स्मृतवान् रुद्रो वीरभद्रं महाबलम् ॥ ३सूतजी बोले— इस प्रकार देवताओंके प्रार्थना करनेपर कृपानिधान शिवने नृसिंहसंज्ञक तेजको नष्ट करनेका निश्चय किया और इसके लिये रुद्रने महाप्रलय करनेवाले अपने भैरवरूप महाबली वीरभद्रका स्मरण किया ॥ २-३ १/२ ॥
आत्मनो भैरवं रूपं महाप्रलयकारकम्।<br>आजगाम पुरा सद्यो गणानामग्रतो हसन् ॥ ४<br>साट्टहासैर्गणवरैरुत्पतद्भिरितस्ततः।<br>नृसिंहरूपैरत्युग्रैः कोटिभिः परिवारितः ॥ ५<br>तावद्भिरभितो वीरैर्नृत्यद्भिश्च मुदान्वितैः।<br>क्रीडद्भिश्च महाधीरैर्ब्रह्माद्यैः कन्दुकैरिव ॥ ६<br>अदृष्टपूर्वैर्न्यैश्च वेष्टितो वीरवन्दितः।<br>कल्पान्तज्वलनज्वालो विलसल्लोचनत्रयः ॥ ७<br>आत्तशस्त्रो जटाजूटे ज्वलद्बालेन्दुमण्डितः।<br>बालेन्दुद्वितयाकारतीक्ष्णदंष्ट्राङ्कुरद्वयः ॥ ८<br>आखण्डलधनुः खण्डसन्निभभ्रूलतायुतः।<br>महाप्रचण्डहुङ्कारबधिरीकृतदिङ्मुखः ॥ ९<br>नीलमेघाञ्जनाकारभीषणश्मश्रुरद्भुतः।<br>वादखण्डमखण्डाभ्यां भ्रामयंस्त्रिशिखं मुहुः ॥ १०<br>वीरभद्रोऽपि भगवान् वीरशक्तिविजृम्भितः।<br>स्वयं विज्ञापयामास किमत्र स्मृतिकारणम् ॥ ११<br>आज्ञापय जगत्स्वामिन् प्रसादः क्रियतां मयि।तब वे [वीरभद्र] गणोंके आगे होकर हँसते हुए शीघ्र ही वहाँ आये। वे करोड़ों श्रेष्ठ गणोंसे घिरे हुए थे, जो अट्टहास कर रहे थे, इधर-उधर उछल रहे थे, नृसिंहके रूपवाले थे तथा अत्यन्त उग्र थे। वे नृत्य करते हुए तथा महाधीर ब्रह्मा आदिके साथ गेंदकी भाँति खेलते हुए प्रसन्न वीरोंसे घिरे हुए थे। वे वीरवन्द्य [वीरभद्र] कभी न देखे गये अन्य वीरोंसे भी आवृत थे। वे [वीरभद्र] प्रलयाग्निकी ज्वालाके समान थे, वे तीन नेत्रोंसे विभूषित थे, वे शस्त्र धारण किये हुए थे, उनके जटाजूटमें देदीप्यमान बालचन्द्रमा शोभा दे रहा था, वे बालचन्द्रके समान आकारवाले अति शुभ्र तथा तीक्ष्ण दो दाँतोंसे सुशोभित थे, वे इन्द्रधनुषके समान भौंहोंसे युक्त थे, वे अपने महाप्रचण्ड हुंकारसे दिशाओंको वधिर बना दे रहे थे, वे नील मेघ तथा अंजनके समान आकारवाले भयंकर श्मश्रु (दाढ़ी)-से युक्त थे, वे अद्भुत रूपवाले थे और अपनी अपराजित भुजाओंसे विवादका शमन करनेवाले त्रिशूलको बार-बार घुमा रहे थे। इस प्रकारकी वीरताकी शक्तिसे परिपूर्ण भगवान् वीरभद्रने स्वयं निवेदन किया—‘हे जगत्स्वामिन्! यहाँपर मुझको स्मरण करनेका क्या कारण है? आज्ञा प्रदान