श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ९६ ] भगवान् महेश्वरद्वारा वीरभद्रका आवाहन... नृसिंहद्वारा शिवस्तुति ५०३
| श्लोक (मूल संस्कृत) | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कीजिये और मुझपर कृपा कीजिये॥ ४-११ १/२॥ | |
| श्रीभगवानुवाच<br>अकाले भयमुत्पन्नं देवानापि भैरव॥ १२<br>ज्वलितः स नृसिंहाग्निः शमयैनं दुरासदम्।<br>सान्त्वयन् बोधयादौ तं तेन किं नोपशाम्यति॥ १३<br>ततो मत्परमं भावं भैरवं सम्प्रदर्शय।<br>सूक्ष्मं सूक्ष्मेण संहृत्य स्थूलं स्थूलेन तेजसा॥ १४<br>वक्त्रमानय कृत्तिं च वीरभद्र ममाज्ञया। | श्रीभगवान् बोले—हे भैरव! असमयमें देवताओंके समक्ष भय उत्पन्न हो गया है; वह नृसंहरूपी अग्नि प्रज्वलित हो रही है; इस अति भयंकर अग्निको शान्त करो। उसे सान्त्वना देते हुए पहले समझाओ, यदि उससे वह शान्त नहीं होती है, तब मेरे महाभयंकर भैरवरूपको दिखाओ। हे वीरभद्र! मेरी आज्ञासे सूक्ष्मरूपको सूक्ष्म तेजसे तथा स्थूलरूपको स्थूल तेजसे विनष्ट करके उसके मुख तथा उसकी त्वचाको [मेरे पास] ले आओ॥ १२-१४ १/२॥ |
| इत्यादिष्टो गणाध्यक्षः प्रशान्तवपुरास्थितः॥ १५<br>जगाम रंहसा तत्र यत्रास्ते नरकेसरी।<br>ततस्तं बोधयामास वीरभद्रो हरो हरिम्॥ १६<br>उवाच वाक्यमीशानः पितापुत्रमिवौरसम्। | इस प्रकार आज्ञा प्राप्त किये हुए गणेश्वर वीरभद्र शान्तस्वरूप धारण करके वेगपूर्वक वहाँ पहुँच गये, जहाँ नृसिंह विराजमान थे। तदनन्तर भगवान् वीरभद्रने नृसंहरूपधारी उन विष्णुको समझाया और जैसे पिता औरस पुत्रसे कहता है, उसी प्रकार ईशान [वीरभद्र] उनसे यह वचन कहने लगे॥ १५-१६ १/२॥ |
| श्रीवीरभद्र उवाच<br>जगत्सुखाय भगवन्नवतीर्णोऽसि माधव॥ १७<br>स्थित्यर्थेन च युक्तोऽसि परेण परमेष्ठिना।<br>जन्तुचक्रं भगवता रक्षितं मत्स्यरूपिणा॥ १८<br>पुच्छेनैव समाबध्य भ्रमन्नेकार्णवे पुरा।<br>बिभर्षि कूर्मरूपेण वाराहेणोद्धृता मही॥ १९<br>अनेन हरिरूपेण हिरण्यकशिपुर्हतः।<br>वामनेन बलिर्बद्धस्त्वया विक्रमता पुनः॥ २० | श्रीवीरभद्र बोले—हे भगवन्! हे माधव! आप तो जगत्के सुखके लिये अवतीर्ण हुए हैं; श्रेष्ठ ब्रह्माने [संसारकी] स्थितिके कार्यमें आपको लगाया है। पूर्वकालमें अपनी पूँछमें [नावको] बाँधकर विशाल सागरमें भ्रमण करते हुए मत्स्यरूपधारी आप भगवान् [विष्णु]-ने जीव-समुदायकी रक्षा की थी। आप कूर्मके रूपसे जगत्को धारण करते हैं और वाराहरूपके द्वारा आपने पृथ्वीका उद्धार किया है। आपने इस सिंहरूपसे हिरण्यकशिपुका वध किया है। आपने वामनरूप धारणकर तीन पगोंद्वारा त्रिलोकीको मापकर बलिको बाँध लिया था॥ १७-२०॥ |
| त्वमेव सर्वभूतानां प्रभवः प्रभुरव्ययः।<br>यदा यदा हि लोकस्य दुःखं किञ्चित्प्रजायते॥ २१<br>तदा तदावतीर्णस्त्वं करिष्यसि निरामयम्।<br>नाधिकस्त्वत्समोऽप्यस्ति हरे शिवपरायण॥ २२<br>त्वया धर्माश्च वेदाश्च शुभे मार्गे प्रतिष्ठिताः।<br>यदर्थमवतारोऽयं निहतः सोऽपि केशव॥ २३ | आप ही सभी प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाले, सबके स्वामी और अविनाशी हैं। जब-जब संसारपर कोई विपत्ति पड़ी है, तब-तब आपने अवतार लेकर उसे दुःखरहित किया है। हे हरे! हे शिवपरायण! आपसे बढ़कर अन्य कोई भी नहीं है। आपने [समस्त] धर्मों तथा वेदोंको उत्तम मार्गपर प्रतिष्ठित किया है। हे केशव! जिसके लिये आपने यह अवतार लिया है, वह [हिरण्यकशिपु भी] आपके द्वारा मारा जा चुका है। |