श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| अत्यन्तघोरं भगवन्नरसिंहवपुस्तव।<br>उपसंहर विश्वात्मंस्त्वमेव मम सन्निधौ॥ २४ | अतः हे भगवन्! हे विश्वात्मन्! हे नरसिंह! आप मेरी उपस्थितिमें अपने इस अत्यन्त भयानक रूपको समेट लीजिये॥ २१-२४॥ | | सूत उवाच<br>इत्युक्तो वीरभद्रेण नृसिंहः शान्तया गिरा।<br>ततोऽधिकं महाघोरं कोपं प्रज्वालयद्धरिः॥ २५ | **सूतजी बोले—**वीरभद्रके द्वारा शान्त वाणीमें इस प्रकार कहे जानेपर नृसिंहरूपधारी विष्णुने पहलेसे भी अधिक तथा महाभयानक कोपको प्रज्वलित किया॥ २५॥ | | श्रीनृसिंह उवाच<br>आगतोऽसि यतस्तत्र गच्छ त्वं मा हितं वद।<br>इदानीं संहरिष्यामि जगदेतच्चराचरम्॥ २६<br>संहर्तुर्न हि संहारः स्वतो वा परतोऽपि वा।<br>शासितं मम सर्वत्र शास्ता कोऽपि न विद्यते॥ २७<br>मत्प्रसादेन सकलं समर्यादं प्रवर्त्तते।<br>अहं हि सर्वशक्तीनां प्रवर्त्तकनिवर्त्तकः॥ २८ | श्रीनृसिंह बोले—[हे वीरभद्र!] तुम जहाँसे आये हो, वहाँ चले जाओ; हितकी बात मत बोलो। मैं इस समय इस चराचर जगत्का संहार कर डालूँगा। संहारकर्ताका संहार अपनेसे अथवा दूसरेसे भी नहीं हो सकता है। सभी जगह मेरा ही शासन है; अन्य कोई भी शासन करनेवाला नहीं है। मेरी कृपासे सम्पूर्ण जगत् मर्यादायुक होकर क्रियाशील है; मैं ही सभी शक्तियोंका प्रवर्त्तक तथा निवर्त्तक हूँ॥ २६-२८॥ | | यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।<br>तत्तद्विद्धि गणाध्यक्ष मम तेजोविजृम्भितम्॥ २९<br>देवतापरमार्थज्ञा ममैव परमं विदुः।<br>मदंशाः शक्तिसम्पन्ना ब्रह्मांशक्रादयः सुराः॥ ३०<br>मन्नाभिपङ्कजाज्जातः पुरा ब्रह्मा चतुर्मुखः।<br>तल्ललाटसमुत्पन्नो भगवान् वृषभध्वजः॥ ३१ | हे गणाध्यक्ष! जो-जो विभूतिसम्पन्न, सत्त्वमय, श्रीयुक्त तथा ऊर्जासे परिपूर्ण है, उसे मेरे ही तेजसे परिवर्धित जानो। देवताओंके परम अर्थको जाननेवाले मेरे महान् सामर्थ्यको जानते हैं। शक्तिसम्पन्न ब्रह्मा, इन्द्र आदि देवता मेरे ही अंश हैं। पूर्वकालमें चतुर्मुख ब्रह्मा मेरे नाभिकमलसे उत्पन्न हुए थे और उनके ललाटसे भगवान् वृषभध्वज (शिव) उत्पन्न हुए थे॥ २९-३१॥ | | रजसाधिष्ठितः स्रष्टा रुद्रस्तामस उच्यते।<br>अहं नियन्ता सर्वस्य मत्परं नास्ति दैवतम्॥ ३२<br>विश्वाधिकः स्वतन्त्रश्च कर्ता हर्ताखिलेश्वरः।<br>इदं तु मत्परं तेजः कः पुनः श्रोतुमिच्छति॥ ३३<br>अतो मां शरणं प्राप्य गच्छ त्वं विगतज्वरः।<br>अवेहि परमं भावमिदं भूतमहेश्वरः॥ ३४ | ब्रह्मा रजोगुणसे अधिष्ठित हैं। रुद्र तमोगुणसे युक्त कहे जाते हैं। मैं सबका नियन्ता हूँ; मुझसे श्रेष्ठ कोई देवता नहीं है। मैं सबसे बढ़कर हूँ, स्वतन्त्र हूँ, सबका स्रष्टा हूँ, संहार करनेवाला हूँ तथा सबका स्वामी हूँ। मेरे इस [नृसिंह नामक] परम तेजके विषयमें कौन सुनना चाहता है? अतः मेरी शरण प्राप्त करके तुम संतापरहित होकर [यहाँसे] जाओ; भूतोंके महेश्वर तुम मेरे इस परम भावको समझो॥ ३२-३४॥ | | कालोऽस्म्यहं कालविनाशहेतु-<br>र्लोकान् समाहर्तुमहं प्रवृत्तः।<br>मृत्योर्मृत्युं विद्धि मां वीरभद्र<br>जीवन्त्येते मत्प्रसादेन देवाः॥ ३५ | मैं काल हूँ, मैं कालके भी विनाशका कारण हूँ। मैं लोकोंका संहार करनेमें प्रवृत्त हूँ। हे वीरभद्र! तुम मुझको मृत्युकी भी मृत्यु जानो; ये देवता भी मेरी कृपासे जी रहे हैं॥ ३५॥ | | सूत उवाच<br>साहङ्कारमिदं श्रुत्वा हरेरमितविक्रमः।<br>विहस्योवाच सावज्ञं ततो विस्फुरिताधरः॥ ३६ | **सूतजी बोले—**विष्णुका यह अहंकारपूर्ण वचन सुनकर असीम पराक्रमवाले वीरभद्र स्फुरित ओठोंवाले |