भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय ९६] भगवान् महेश्वरद्वारा वीरभद्रका आवाहन... नृसिंहद्वारा शिवस्तुति [५०५

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
श्रीवीरभद्र उवाच<br><br>किं न जानासि विश्वेशं संहर्तारं पिनाकिनम्।<br>असद्वादो विवादश्च विनाशस्त्वयि केवलः ॥ ३७<br><br>तवान्योन्यावताराणि कानि शेषाणि साम्प्रतम्।<br>कृतानि येन केनापि कथाशेषो भविष्यति ॥ ३८<br><br>दोषं त्वं पश्य एतत्त्वमवस्थामीदृशीं गतः।<br>तेन संहारदक्षेण क्षणात्सङ्क्षयमेष्यसि ॥ ३९होकर तिरस्कारपूर्ण भावसे हँसकर नृसिंहसे कहने लगे ॥ ३६ ॥<br><br>श्रीवीरभद्र बोले—क्या आप संहारकर्ता, पिनाकधारी विश्वेश्वर (शिव)-को नहीं जानते हैं? मिथ्या वाद-विवाद आपके लिये केवल विनाशस्वरूप ही है। जिस किसी प्रकारसे आपके द्वारा लिये गये विभिन्न अवतारोंमें कौन शेष रह गये हैं; अब तो केवल आप ही बचे हुए हैं। आप इस दोषको देखिये, जो आप इस दशाको प्राप्त हुए हैं। संहारमें दक्ष उन [शिव]-के द्वारा आप क्षणभरमें विनाशको प्राप्त हो जायेंगे ॥ ३७—३९ ॥
प्रकृतिस्त्वं पुमान् रुद्रस्त्वयि वीर्यं समाहितम्।<br>त्वन्नाभिपङ्कजाज्जातः पञ्चवक्त्रः पितामहः ॥ ४०<br><br>सृष्ट्यर्थेन जगत्पूर्वं शङ्करं नीललोहितम्।<br>ललाटे चिन्तयामास तपस्युग्रे व्यवस्थितः ॥ ४१<br><br>तल्ललाटाद्भूच्छम्भोः सृष्ट्यर्थं तन्न दूषणम्।<br>अंशोऽहं देवदेवस्य महाभैरवरूपिणः ॥ ४२<br><br>त्वत्संहारे नियुक्तोऽस्मि विनयेन बलेन च।<br>एवं रक्षो विदार्यैव त्वं शक्तिकलया युतः ॥ ४३<br><br>अहङ्कारावलेपेन गर्जसि त्वमतन्द्रितः।<br>उपकारो ह्यसाधूनामपकाराय केवलम् ॥ ४४<br><br>यदि सिंह महेशानं स्वपुनर्भूतं मन्यसे।<br>न त्वं स्रष्टा न संहर्ता न स्वतन्त्रो हि कुत्रचित् ॥ ४५आप प्रकृति हैं, रुद्र पुरुष हैं; आपमें [सम्पूर्ण] तेज समाहित है। पाँच मुखवाले पितामह (ब्रह्मा) आपके नाभिकमलसे प्रादुर्भूत हुए हैं। घोर तपस्यामें लीन उन्होंने पूर्वकालमें जगत्की सृष्टिके लिये अपने ललाटमें नीललोहित शंकरका चिन्तन किया। तब सृष्टिके लिये उनके ललाटसे शम्भु आविर्भूत हुए, अतः यह शिवका दूषण नहीं है। महाभैरवरूप देवदेव रुद्रका अंशस्वरूप मैं विनय तथा बलसे आपके संहारके लिये नियुक्त किया गया हूँ। इस प्रकार शक्तिकी कलासे युक्त आप इस राक्षसको विदीर्ण करके अहंकारके वशीभूत होकर निरालस्य हो गर्जन कर रहे हैं। दुष्टोंके लिये किया गया उपकार केवल अपकारके लिये होता है। हे सिंह! यदि आप महेश्वरको अपनेसे बादमें उत्पन्न समझते हैं, तो यह आपका भ्रम है। आप न तो सृष्टिकर्ता हैं, न संहारकर्ता हैं और न तो किसी प्रकार स्वतन्त्र ही हैं; आप कुम्हारके चक्रकी भाँति शिवके द्वारा प्रेरित हैं ॥ ४०—४५ १/२ ॥
कुलालचक्रवच्छक्त्या प्रेरितोऽसि पिनाकिना।<br>अद्यापि तव निक्षिप्तं कपालं कूर्मरूपिणः ॥ ४६<br><br>हरहारलतामध्ये मुग्ध कस्मान्न बुध्यसे।<br>विस्मृतं किं तदंशेन दंष्ट्रोत्पातनपीडितः ॥ ४७<br><br>वाराहविग्रहस्तेऽद्य साक्रोशं तारकारिणा।<br>दग्धोऽसि यस्य शूलाग्रे विष्वक्सेनच्छलाद्द्रवान् ॥ ४८कूर्मरूपधारी आपका कपाल आज भी शिवके गलेके हारके मध्य स्थित है; हे मुग्ध! इसे आप क्यों नहीं याद कर रहे हैं? उनके अंशसे उत्पन्न तारकासुरशत्रु स्कन्दके द्वारा आक्रोशपूर्वक आपके वाराहविग्रहसे दाँत उखाड़ लिये जानेसे आपको बहुत कष्ट हुआ था; क्या इसे भी आप भूल गये हैं? विष्वक्सेनरूपसे आप उन रुद्रके त्रिशूलके अग्रभागसे छलपूर्वक जला दिये गये थे ॥ ४६—४८ ॥