श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| ५०६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| दक्षयज्ञे शिरश्छिन्नं मया ते यज्ञरूपिणः।<br>अद्यापि तव पुत्रस्य ब्रह्मणः पञ्चमं शिरः ॥ ४९<br><br>छिन्नं तमेनाभिसन्ध्यं तदंशं तस्य तद्बलम्।<br>निर्जितस्त्वं दधीचेन सङ्ग्रामे समरुद्गणः ॥ ५०<br><br>कण्डूयमाने शिरसि कथं तद्विस्मृतं त्वया।<br>चक्रं विक्रमतो यस्य चक्रपाणे तव प्रियम् ॥ ५१<br><br>कुतः प्राप्तं कृतं केन त्वया तदपि विस्मृतम्।<br>ते मया सकला लोका गृहीतास्त्वं पयोनिधौ ॥ ५२<br><br>निद्रापरवशः शेषे स कथं सात्त्विको भवान्।<br>त्वदादिस्तम्बपर्यन्तं रुद्रशक्तिविजृम्भितम् ॥ ५३ | मैंने दक्षके यज्ञमें यज्ञरूपधारी आपके सिरको काट दिया था। आपके पुत्र ब्रह्माका तमोमय कटा हुआ उनका अंशभूत पाँचवाँ सिर आज भी विद्यमान है; क्या आप उन रुद्रके उस बलको नहीं जानते हैं? ऋषि दधीचने सिर खुजलाते हुए आपको मरुद्गणोंसहित संग्राममें पराजित कर दिया था; इसे आप कैसे भूल गये? हे चक्रपाणे! आपका प्रिय चक्र उन्हींके पराक्रमके कारण है; आपने उसे कहाँसे प्राप्त किया, उसे किसने बनाया—यह सब भी आप भूल गये! मैंने आपके सभी लोकोंको छीन लिया था और उस समय आप निद्राके वशीभूत होकर क्षीरसागरमें शयन करते रहे; आप सात्त्विक (पालकमूर्ति) कैसे हो सकते हैं, आप [विष्णु]–से लेकर तृणपर्यन्त सब कुछ रुद्रशक्तिसे समन्वित है॥ ४९–५३॥ |
| शक्तिमानभितस्त्वं च ह्यानलस्त्वं च मोहितः।<br>तत्तेजसोऽपि माहात्म्यं युवां द्रष्टुं न हि क्षमौ ॥ ५४<br><br>स्थूला ये हि प्रपश्यन्ति तद्विष्णोः परमं पदम्।<br>द्यावापृथिव्या इन्द्राग्नियमस्य वरुणस्य च ॥ ५५<br><br>ध्वान्तोदरे शशाङ्कस्य जनित्वा परमेश्वरः।<br>कालोऽसि त्वं महाकालः कालकालो महेश्वरः ॥ ५६<br><br>अतस्त्वमुग्रकलया मृत्योर्मृत्युर्भविष्यसि।<br>स्थिरधन्वाक्षयोऽवीरो वीरो विश्वाधिकः प्रभुः ॥ ५७<br><br>उपहस्ता ज्वरं भीमो मृगपक्षहिरण्मयः।<br>शास्ताशेषस्य जगतो न त्वं नैव चतुर्मुखः ॥ ५८<br><br>इत्थं सर्वं समालोक्य संहरात्मानमात्मना।<br>नो चेदिदानीं क्रोधस्य महाभैरवरूपिणः ॥ ५९<br><br>वज्राशनिरिव स्थाणोस्त्वेवं मृत्युः पतिष्यति। | मोहको प्राप्त आप तथा अग्नि दोनों ही रुद्रकी शक्तिसे सामर्थ्ययुक्त हैं; उनके तेजके प्रभावको देखनेमें आप दोनों (विष्णु, अग्नि) समर्थ नहीं हैं। जो स्थूल दृष्टिवाले हैं, वे ही विष्णुके परम पदको देखते हैं। स्वर्ग-पृथ्वीके वामनरूपसे, इन्द्रके जयन्तरूपसे, अग्निके कार्तिकेय-रूपसे, धर्मराजके नारायणरूपसे, वरुणके भृगुरूपसे और चन्द्रमाके कलंकित उदरमें बुधरूपसे उत्पन्न होकर आप परमेश्वरके रूपमें प्रतिष्ठित हैं। आप काल, महाकाल एवं कालके भी काल महेश्वर हैं; अतः आप शिवके अंशसे कालके भी काल होंगे। वे स्थिर धनुषवाले शिव अनश्वर, सबसे अधिक पराक्रमी, वीर, सर्वश्रेष्ठ तथा सबके स्वामी हैं। वे रोगको नष्ट करनेवाले, भयानक तथा सुवर्णमय मृगाकार पक्षी (शरभरूप) हैं। सम्पूर्ण जगत्के शासक न तो आप हैं और न चतुर्मुख ब्रह्मा। इस प्रकार सब कुछ सोचकर अपने रूपको पूर्णरूपसे समेट लीजिये, अन्यथा महाभैरवरूपी रुद्रके क्रोधका शरभरूपी वज्र आपकी मृत्यु बनकर उसी तरह गिरेगा, जैसे पर्वतपर वज्र गिरता है॥ ५४–५९ १/२ ॥ |
| सूत उवाच<br>इत्युक्तो वीरभद्रेण नृसिंहः क्रोधविह्वलः ॥ ६०<br><br>ननाद तनुवेगेन तं गृहीतुं प्रचक्रमे।<br>अत्रान्तरे महाघोरं विपक्षभयकारणम् ॥ ६१ | **सूतजी बोले—**वीरभद्रके इस प्रकार कहनेपर नृसिंह क्रोधसे व्याकुल होकर गरजने लगे और तीव्र वेगसे |