भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय ९६] भगवान् महेश्वरद्वारा वीरभद्रका आवाहन... नृसिंहद्वारा शिवस्तुति | ५०७

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
गगनव्यापि दुर्धर्षंशैवतेजः समुद्भवम्।<br>वीरभद्रस्य तद्रूपं तत्क्षणादेव दृश्यते॥ ६२<br><br>न तद्धिरण्मयं सौम्यं न सौरं नाग्निसम्भवम्।<br>न तडिच्चन्द्रसदृशमनौपम्यं महेश्वरम्॥ ६३<br><br>तदा तेजांसि सर्वाणि तस्मिन् लीनानि शाङ्करे।<br>ततोऽव्यक्तो महातेजा व्यक्ते सम्भवतस्ततः॥ ६४उसे पकड़नेका प्रयास करने लगे। इसी बीच विपक्षमें भय उत्पन्न करनेवाला, महाभयंकर, गगनव्यापी तथा दुर्धर्ष शिव-तेज उत्पन्न हुआ। उस क्षण वीरभद्रका जो रूप दिखायी पड़ा; वह न सुवर्णमय था, न चन्द्रमासे उत्पन्न था, न सूर्यसे उत्पन्न था, न अग्निसे उत्पन्न था, न विद्युत्के समान था और न चन्द्रके तुल्य था। वह शिवसे सम्बन्धित अनुपम रूप था। उस समय सभी तेज उस शिव-रूपमें विलीन हो गये; इससे वह महातेज अव्यक्तरूपमें स्थित हो गया और शरभ-नृसिंह—ये दो व्यक्तरूप प्रकट हुए॥ ६०—६४॥
रुद्रसाधारणं चैव चिह्नितं विकृताकृति।<br>ततः संहाररूपेण सुव्यक्तः परमेश्वरः॥ ६५<br><br>पश्यतां सर्वदेवानां जयशब्दादिमङ्गलैः।<br>सहस्रबाहुर्जटिलश्चन्द्रार्धकृतशेखरः ॥ ६६<br><br>स मृगार्धशरीरेण पक्षाभ्यां चञ्चुना द्विजाः।<br>अतितीक्ष्णमहादंष्ट्रो वज्रतुल्यनखायुधः॥ ६७<br><br>कण्ठे कालो महाबाहुश्चतुष्पादग्निसम्भवः।<br>युगान्तोद्यतजीमूतभीमगम्भीरनिःस्वनः ॥ ६८<br><br>समं कुपितवृत्ताग्निव्यावृत्तनयनत्रयः।<br>स्पष्टदंष्ट्रोऽधरोष्ठश्च हुङ्कारेण युतो हरः॥ ६९उस समय भयंकर आकृतिवाला तथा रुद्रके विशिष्ट चिह्नोंसे युक्त रूप प्रकट हुआ। तदनन्तर वे परमेश्वर महाप्रलयकालिक रूपसे व्यक्त (प्रकट) हो गये। हे द्विजो! सभी देवताओंके देखते-देखते जयशब्द आदि मंगलोंसे युक्त होकर वे शिव हजार भुजाओंवाले, जटाधारी, सिरपर अर्धचन्द्र धारण किये हुए, पशुके आधा भाग शरीरसे, दो पंखोंसे तथा चोंचसे युक्त हो गये। उनके दाँत विशाल तथा अति तीक्ष्ण थे। वे वज्रतुल्य नखरूपी अस्त्रसे सुशोभित हो रहे थे। उनका कण्ठ कृष्णवर्णका था। वे चार भुजाओंवाले तथा चार पैरोंवाले और अग्निसे उत्पन्न प्रतीत हो रहे थे। वे युगके अन्तमें उत्पन्न मेघके समान भयंकर तथा गम्भीर ध्वनि कर रहे थे। उनके तीनों नेत्र क्रोधसे फैले हुए विशाल आगके गोले हो गये थे। उनके दाँत, अधर तथा ओष्ठ स्पष्ट दिखायी पड़ रहे थे। वे हर हुंकारसे युक्त थे॥ ६५—६९॥
हरिस्तद्दर्शनादेव विनष्टबलविक्रमः।<br>बिभ्रदौर्म्यं सहस्त्रांशोरधः खद्योतविभ्रमम्॥ ७०<br><br>अथ विभ्रम्य पक्षाभ्यां नाभिपादेऽभ्युदारयन्।<br>पादावाबध्य पुच्छेन बाहुभ्यां बाहुमण्डलम्॥ ७१<br><br>भिदन्नुरसि बाहुभ्यां निजग्राह हरो हरिम्।<br>ततो जगाम गगनं देवैः सह महर्षिभिः॥ ७२<br><br>सहसैव भयाद्विष्णुं विहगश्च यथोरगम्।<br>उत्क्षिप्योत्क्षिप्य सङ्गृह्य निपात्य च निपात्य च॥ ७३<br><br>उड्डीयोड्डीय भगवान् पक्षाघातविमोहितम्।<br>हरिं हरं तं वृषभं विश्वेशानं तमीश्वरम्॥ ७४उन्हें देखते ही विष्णुका बल तथा पराक्रम नष्ट हो गया। वे सूर्यके सम्मुख खद्योत (जुगनू)-के समान प्रकाश धारण किये हुए प्रतीत होने लगे। इसके बाद हररूप शरभने अपने पंखोंसे उन्हें जकड़कर नाभि तथा पैरको विदीर्ण करते हुए अपनी पूँछसे पैरोंको बाँधकर भुजाओंसे उनके भुजाओंको कसकर उनके वक्षपर प्रहार करते हुए उन हरिको अपनी भुजाओंमें जकड़ लिया। तदनन्तर वे भगवान् [शरभ] जैसे गरुड़ सर्पपर आक्रमण करता है, वैसे ही उड़-उड़कर उन्हें ऊपरकी ओर उछालकर बार-