श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| ५०८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अनुयान्ति सुराः सर्वे नमोवाक्येन तुष्टुवुः।<br>नीयमानः परवशो दीनवक्त्रः कृताञ्जलिः॥ ७५<br>तुष्टाव परमेशानं हरिस्तं ललिताक्षरैः।<br><br>श्रीनृसिंह उवाच<br><br>नमो रुद्राय शर्वाय महाग्रासाय विष्णवे॥ ७६<br>नम उग्राय भीमाय नमः क्रोधाय मन्यवे।<br>नमो भवाय शर्वाय शङ्कराय शिवाय ते॥ ७७<br>कालकालाय कालाय महाकालाय मृत्यवे।<br>वीराय वीरभद्राय क्षयद्वीराय शूलिने॥ ७८<br>महादेवाय महते पशूनां पतये नमः।<br>एकाय नीलकण्ठाय श्रीकण्ठाय पिनाकिने॥ ७९<br>नमोऽनन्ताय सूक्ष्माय नमस्ते मृत्युमन्यवे।<br>पराय परमेशाय परात्परतराय ते॥ ८०<br>परात्पराय विश्वाय नमस्ते विश्वमूर्तये।<br>नमो विष्णुकलत्राय विष्णुक्षेत्राय भानवे॥ ८१<br>कैवर्ताय किराताय महाव्याधाय शाश्वते।<br>भैरवाय शरण्याय महाभैरवरूपिणे॥ ८२<br>नमो नृसिंहसंहर्त्रे कामकालपुरारये।<br>महापाशौघसंहर्त्रे विष्णुमायान्तकारिणे॥ ८३<br>त्र्यम्बकाय त्र्यक्षराय शिपिविष्टाय मीढुषे।<br>मृत्युञ्जयाय शर्वाय सर्वज्ञाय मखारये॥ ८४<br>मखेशाय वरेण्याय नमस्ते वह्निरूपिणे।<br>महाघ्राणाय जिह्वाय प्राणापानप्रवर्तिने॥ ८५<br>त्रिगुणाय त्रिशूलाय गुणातीताय योगिने।<br>संसाराय प्रवाहाय महायन्त्रप्रवर्तिने॥ ८६<br>नमश्चन्द्राग्निसूर्याय मुक्तिवैचित्र्यहेतवे।<br>वरदायावताराय सर्वकारणहेतवे॥ ८७<br>कपालिने करालाय पतये पुण्यकीर्तये।<br>अमोघायाग्निनेत्राय लकुलीशाय शम्भवे॥ ८८<br>भिषक्तमाय मुण्डाय दण्डिने योगरूपिणे।<br>मेघवाहाय देवाय पार्वतीपतये नमः॥ ८९ | बार उन्हें गिराकर पंखोंके आघातसे मूर्छित तथा डरे हुए विष्णुको लेकर देवताओं तथा महर्षियोंके साथ आकाशमण्डलमें चले गये॥ ७०—७३ १/२॥<br><br>सभी देवता विष्णु तथा उन श्रेष्ठ [शरभरूप] विश्वेश ईश्वरके पीछे-पीछे चलने लगे और 'नमः' वाक्यसे उनकी स्तुति करने लगे। परवश होकर ले जाये जाते हुए विष्णु दीनमुख होकर हाथ जोड़कर ललित अक्षरोंद्वारा उन परमेश्वरकी स्तुति करने लगे॥ ७४-७५ १/२॥<br><br>**श्रीनृसिंह बोले—**शर्व, महाग्रास (जगत् जिनका ग्रास है) तथा विष्णु (सर्वव्यापी) एवं रुद्रको नमस्कार है। उग्र तथा भीमको नमस्कार है। क्रोध तथा मन्युको नमस्कार है। आप भव, शर्व, शंकर तथा शिवको नमस्कार है। कालके भी काल, कालरूप, महाकाल, मृत्युरूप, वीर, वीरभद्र, पापके विनाशक, शूलधारी, महादेव, महान् तथा पशुपतिको नमस्कार है। एक, नीलकण्ठ, श्रीकण्ठ, पिनाकी तथा अनन्तको नमस्कार है। आप सूक्ष्मको नमस्कार है। आप मृत्युमन्यु (मृत्यु ही जिसका क्रोध है), पर, परमेश तथा परात्परतरको नमस्कार है। आप परात्पर, विश्व तथा विश्वमूर्तिको नमस्कार है। विष्णुकलत्र, विष्णुक्षेत्र तथा भानुको नमस्कार है। कैवर्त (संसाररूपी सागरसे तारनेवाले), किरात, महाव्याध, शाश्वत, भैरव, शरण्य (शरणदाता) तथा महाभैरवरूपको नमस्कार है। नृसिंहसंहर्ता, कामकालपुरारि (कामदेव-यम-त्रिपुर)-के शत्रु, महापाशौघ-संहर्ता, विष्णुमायान्तकारी, त्र्यम्बक (तीन नेत्रोंवाले), त्र्यक्षर (भूत, भविष्य, वर्तमानमें नाशरहित), शिपिविष्ट, मीढुष, मृत्युंजय, शर्व, सर्वज्ञ, मखारि, मखेश, वरेण्य, अग्निरूप, महाघ्राण, (महानासिकावाले), जिह्व (बड़ी जिह्वावाले) तथा प्राणापानप्रवर्ती (प्राण-अपान वायुको गति देनेवाले)-को नमस्कार है। त्रिगुण-त्रिशूल, गुणातीत, योगी, संसार, प्रवाह, महायन्त्रप्रवर्तीको नमस्कार है। चन्द्र-अग्नि-सूर्य, मुक्ति-विचित्र्यहेतु, वरद, अवतार (अभिमानियोंका पतन करनेवाले), सर्वकारणहेतु, कपाली, कराल, पति, पुण्यकीर्ति, अमोघ, अग्निनेत्र, लकुलीश, शम्भु (कल्याण करनेवाले), भिषक्तम, |