श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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अध्याय १६] भगवान् महेश्वरद्वारा वीरभद्रका आवाहन···नृसिंहद्वारा शिवस्तुति ५०९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अव्यक्ताय विशोकाय स्थिराय स्थिरधन्विने।<br>स्थाणवे कृत्तिवासाय नमः पञ्चार्थहेतवे॥ ९०<br><br>वरदायैकपादाय नमश्चन्द्रार्धमौलिने।<br>नमस्तेऽध्वरराजाय वयसां पतये नमः॥ ९१<br><br>योगीश्वराय नित्याय सत्याय परमेष्ठिने।<br>सर्वात्मने नमस्तुभ्यं नमः सर्वेश्वराय ते॥ ९२<br><br>एकद्वित्रिचतुःपञ्चकृत्वस्तेऽस्तु नमो नमः।<br>दशकृत्वस्तु साहस्त्रकृत्वस्ते च नमो नमः॥ ९३<br><br>नमोऽपरिमितं कृत्वानन्तकृत्वो नमो नमः।<br>नमो नमो नमो भूयः पुनर्भूयो नमो नमः॥ ९४ | मुण्ड, दण्डी, योगरूपी, मेघवाह, देव तथा पार्वतीपतिको नमस्कार है। अव्यक्त, विशोक (शोकरहित), स्थिर, स्थिरधन्वी, स्थाणु (जगत्के आधाररूप), कृत्तिवास तथा पंचार्थहेतुको नमस्कार है। वर तथा एकपाद (एकमात्र ज्ञानियोंके द्वारा प्राप्य)-को नमस्कार है। चन्द्रार्धमौलिको नमस्कार है। अध्वरराज तथा वयसाम्पति (शरभरूप)-को नमस्कार है। आप योगीश्वर, नित्य, सत्य, परमेष्ठी तथा सर्वात्माको नमस्कार है। आप सर्वेश्वरको नमस्कार है। आपको एक, दो, तीन, चार, पाँच बार नमस्कार है। आपको दस बार तथा हजार बार नमस्कार है। आपको अपरिमित बार, अनन्त बार नमस्कार है। आपको बार-बार नमस्कार है; पुनः बार-बार नमस्कार है॥ ७६—९४॥ |
| सूत उवाच<br>नाम्नामष्टशतेनैवं स्तुत्वामृतमयेन तु।<br>पुनस्तु प्रार्थयामास नृसिंहः शरभेश्वरम्॥ ९५<br><br>यदा यदा ममाज्ञानमत्यहङ्कारदूषितम्।<br>तदा तदापनेतव्यं त्वयैव परमेश्वर॥ ९६<br><br>एवं विज्ञापयन् प्रीतः शङ्करं नरकेसरी।<br>नन्वशक्तो भवान् विष्णो जीवितान्तं पराजितः॥ ९७<br><br>तद्वक्त्रशेषमात्रान्तं कृत्वा सर्वस्य विग्रहम्।<br>शुक्तिशित्यं तदा मङ्गं वीरभद्रः क्षणात्ततः॥ ९८ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] इस प्रकार नृसिंह [विष्णु]-ने एक सौ आठ अमृतमय नामोंसे शरभरूप ईश्वर (शिव)-की स्तुति करके पुनः उनसे प्रार्थना की—हे परमेश्वर! जब-जब अति अहंकारसे दूषित अज्ञान मुझमें उत्पन्न हो, तब-तब आप उसे दूर करें। इस प्रकार शंकरसे प्रार्थना करते हुए वे नृसिंह प्रसन्न हो गये; तब वीरभद्रने कहा—'हे विष्णो! आप वास्तवमें अशक्त हैं और जीवनके अन्तमें पराजित हुए हैं।' इसके बाद वीरभद्रने क्षणभरमें ही [नृसिंहरूपधारी] विष्णुके विग्रहको बचे हुए मुखवाला करके शेष विग्रहसे त्वचा खींचकर उसे मात्र हड्डियोंसे युक्त कर दिया और इस प्रकार वह विग्रह अति श्वेत वर्णवाला हो गया॥ ९५—९८॥ |
| देवा ऊचुः<br>अथ ब्रह्मादयः सर्वे वीरभद्र त्वया दृशा।<br>जीविताः स्मो वयं देवाः पर्जन्येनेव पादपाः॥ ९९ | **देवता बोले—**हे वीरभद्र! ब्रह्मा आदि हम सभी देवता आपकी दृष्टिसे उसी प्रकार जीवित हैं, जैसे वृक्ष मेघसे जीवन प्राप्त करते हैं॥ ९९॥ |
| यस्य भीषा दहत्यग्निरुदेति च रविः स्वयम्।<br>वातो वाति च सोऽसि त्वं मृत्युर्धावति पञ्चमः॥ १०० | जिसके भयसे अग्नि जलती है, साक्षात् सूर्य उगता है, वायु बहती है और पाँचवीं* मृत्यु दौड़ती है; वह आप ही हैं॥ १००॥ |
| यदव्यक्तं परं व्योम कलातीतं सदाशिवम्।<br>भगवंस्त्वामेव भवं वदन्ति ब्रह्मवादिनः॥ १०१ | हे भगवन्! ब्रह्मवादी लोग आपको ही अनिर्वाच्य, चिदाकाश, कलातीत, सदाशिव तथा भव कहते हैं॥ १०१॥ |
* कठोपनिषद् २।३।३, तैत्तिरीयोपनिषद् २।८।१