श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 512, कुल 834 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५१० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| के वयमेव धातुर्ये वेदने परमेश्वरः।<br>न विद्धि परमं धाम रूपलावण्यवर्णने ॥ १०२ | आप जगदाधारके विषयमें जाननेमें हम असमर्थ हैं। आप हमारे परमेश्वर हैं। आपके रूपलावण्यवर्णनका अन्त नहीं है—ऐसा जानिये ॥ १०२ ॥ | | उपसर्गेषु सर्वेषु त्रायस्वास्मान् गणाधिप।<br>एकादशात्मन् भगवान् वर्तते रूपवान् हरः ॥ १०३ | हे गणाधिप! सभी विपत्तियोंमें हमलोगोंकी रक्षा कीजिये। हे एकादशरुद्ररूप! आप भगवान् हर विशिष्ट विग्रहवाले हैं ॥ १०३ ॥ | | ईदृशान् तेऽवताराणि दृष्ट्वा शिव बहूंस्तमः।<br>कदाचित्सन्दिहेनास्मांस्त्वच्चिन्तास्तमया तथा ॥ १०४<br><br>गुञ्जागिरिवरतटामितरूपाणि सर्वशः।<br>अभ्यसंहर गम्यं ते न नीतव्यं परापरा ॥ १०५<br><br>द्वे तनू तव रुद्रस्य वेदज्ञा ब्राह्मणा विदुः।<br>घोराप्यन्या शिवाप्यन्या ते प्रत्येकमनेकधा ॥ १०६<br><br>इहास्मान् पाहि भगवन्नित्याहतमहाबलः।<br>भवता हि जगत्सर्वं व्याप्तं स्वेनैव तेजसा ॥ १०७ | हे शिव! आपके इस प्रकारके अनेक अवतारोंको देखकर हमारा अज्ञान हममें कदाचित् सन्देह न उत्पन्न करे तथा आपका ध्यान नष्ट न हो। जैसे गुंजाके महान् पर्वतके प्रान्तभागसे गुंजाओंकी अमित संख्या होती है, वैसे ही आपके अनन्त रूप हैं, जिन्हें आप चारों ओरसे उपसंहृत कर लीजिये। यह संसार आपके प्रवेशयोग्य हो, इसका संहार मत कीजिये। वेदवेत्ता ब्राह्मण कहते हैं कि आप रुद्रके पर-अपर दो शरीर हैं—एक घोर तथा दूसरा शिव (शान्त); उनमें प्रत्येकके अनेक प्रकार हैं। हे भगवन्! कभी भी हत न होनेवाले महान् बलसे युक्त आप यहाँपर हम लोगोंकी रक्षा कीजिये। आपने अपने ही तेजसे सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त कर रखा है ॥ १०४-१०७ ॥ | | ब्रह्मविष्ण्वीन्द्रचन्द्रादि वयं च प्रमुखाः सुराः।<br>सुरासुराः सम्प्रसूतास्त्वत्तः सर्वे महेश्वर ॥ १०८ | हे महेश्वर! ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र-चन्द्र आदि हम प्रमुख देवतागण तथा अन्य देवता और असुर—सभी लोग आपसे उत्पन्न हुए हैं ॥ १०८ ॥ | | ब्रह्मा च इन्द्रो विष्णुश्च यमाद्या न सुरासुरान्।<br>ततो निगृह्य च हरिं सिंह इत्युपचेतसम् ॥ १०९<br><br>यतो बिभर्षि सकलं विभज्य तनुमष्टधा।<br>अतोऽस्मान् पाहि भगवन्सुरान् दानैरभीप्सितैः ॥ ११० | ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु, यम आदि देवता, असुर तथा भ्रान्त अन्तःकरणवाले नृसिंह हरिका निग्रह करके अपने शरीरको आठ प्रकारसे [सूर्य आदि रूपमें] विभाजित करके आप सभीका धारण-पोषण करते हैं; अतः हे भगवन्! अभीष्ट दानोंके द्वारा हम देवताओंकी रक्षा कीजिये ॥ १०९-११० ॥ | | उवाच तान् सुरान् देवो महर्षींश्च पुरातनान्।<br>यथा जले जलं क्षिप्तं क्षीरं क्षीरे घृतं घृते ॥ १११ | तत्पश्चात् देव [वीरभद्र]-ने उन देवताओं तथा प्राचीन ऋषियोंसे कहा—जैसे जलमें जल, दूधमें दूध तथा घृतमें घृत डाले जानेपर एक हो जाता है; वैसे ही | | एक एव तदा विष्णुः शिवलीनो न चान्यथा।<br>एष एव नृसिंहात्मा सदर्पश्च महाबलः ॥ ११२ | विष्णु शिवमें लीन हैं; इसमें सन्देह नहीं है। ये गर्वयुक्त तथा महाबली नृसिंह जगत्का संहार करनेवाले रूपसे प्रकट हुए हैं। मेरी भक्तिकी सिद्धिकी इच्छा रखनेवालोंको | | जगत्संहारकारेण प्रवृत्तो नरकेसरी।<br>याजनीयो नमस्तस्मै मद्भक्तिसिद्धिकाङ्क्षिभिः ॥ ११३ | नृसिंहकी पूजा करनी चाहिये; उन [नृसंहरूपधारी |