श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ९६] भगवान् महेश्वरद्वारा वीरभद्रका आवाहन... नृसिंहद्वारा शिवस्तुति ५११
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| विष्णु]-को नमस्कार है॥१११-११३॥ | |
| एतावदुक्त्वा भगवान् वीरभद्रो महाबलः।<br>अपश्यन् सर्वभूतानां तत्रैवान्तरधीयत॥ ११४<br><br>नृसिंहकृत्तिवसनस्तदाप्रभृति शङ्करः।<br>वक्त्रं तन्मुण्डमालायां नायकत्वेन कल्पितम्॥ ११५ | इतना कहकर महाबली भगवान् वीरभद्र सभी देवताओंके देखते-देखते वहींपर अन्तर्धान हो गये। उसी समयसे शंकरजी नृसिंहके चर्मको वस्त्रके रूपमें धारण करने लगे और [नृसिंहका] मुण्ड उनकी मुण्डमालामें मणिके रूपमें शोभा पाने लगा॥ ११४-११५॥ |
| ततो देवा निरातङ्काः कीर्तयन्तः कथामिमाम्।<br>विस्मयोत्फुल्लनयना जग्मुः सर्वे यथागतम्॥ ११६ | तदनन्तर विस्मयसे प्रसन्न नेत्रवाले सभी देवतागण भयरहित होकर इस कथाको कहते हुए जैसे आये थे, वैसे ही वापस चले गये॥ ११६॥ |
| य इदं परमाख्यानं पुण्यं वेदैः समन्वितम्।<br>पठित्वा शृणुते चैव सर्वदुःखविनाशनम्॥ ११७<br><br>धन्यं यशस्यमायुष्यमारोग्यं पुष्टिवर्धनम्।<br>सर्वविघ्नप्रशमनं सर्वव्याधिविनाशनम्॥ ११८<br><br>अपमृत्युप्रशमनं महाशान्तिकरं शुभम्।<br>अरिचक्रप्रशमनं सर्वाधिप्रविनाशनम्॥ ११९<br><br>ततो दुःस्वप्नशमनं सर्वभूतनिवारणम्।<br>विषग्रहक्षयकरं पुत्रपौत्रादिवर्धनम्॥ १२०<br><br>योगसिद्धिप्रदं सम्यक् शिवज्ञानप्रकाशकम्।<br>शेषलोकस्य सोपानं वाञ्छितार्थैकसाधनम्॥ १२१<br><br>विष्णुमायानिरसनं देवतापरमार्थदम्।<br>वाञ्छासिद्धिप्रदं चैव ऋद्धिप्रज्ञादिसाधनम्॥ १२२ | जो [मनुष्य] इस पुण्यप्रद तथा वेदमय श्रेष्ठ आख्यानको पढ़ता अथवा सुनता है, उसके सभी दुःखोंका नाश हो जाता है। यह [आख्यान] धन्य बनानेवाला, यश देनेवाला, आयु प्रदान करनेवाला, रोगरहित करनेवाला, पुष्टिकी वृद्धि करनेवाला, सभी विघ्नोंको शान्त करनेवाला, सभी व्याधियोंको नष्ट करनेवाला, अकाल मृत्युका शमन करनेवाला, परमशान्ति प्रदान करनेवाला, मंगलकारक, शत्रु-समूहका दमन करनेवाला, सभी मानसिक रोगोंका विनाश करनेवाला, बुरे स्वप्नोंका निवारण करनेवाला, सभी भूत-प्रेतको दूर करनेवाला, दुष्ट ग्रहोंका क्षय करनेवाला, पुत्र-पौत्रकी वृद्धि करनेवाला, योग-सिद्धि प्रदान करनेवाला, भली-भाँति शिवज्ञानको प्रकाशित करनेवाला, शेषलोकका सोपानस्वरूप, वांछित फलोंको सिद्ध करनेवाला, विष्णुमायाको दूर करनेवाला, देवताओंके परमार्थको देनेवाला, वांछाकी सिद्धि प्रदान करनेवाला और ऋद्धि, प्रज्ञा आदि देनेवाला है॥ ११७-१२२॥ |
| इदं तु शरभाकारं परं रूपं पिनाकिनः।<br>प्रकाशितव्यं भक्तेषु चिरेषूद्यमितेषु च॥ १२३<br><br>तैरैव पठितव्यं च श्रोतव्यं च शिवात्मभिः।<br>शिवोत्सवेषु सर्वेषु चतुर्दश्यष्टमीषु च॥ १२४<br><br>पठेत्प्रतिष्ठाकालेषु शिवसन्निधिकारणम्।<br>चोरव्याघ्रादिसिंहान्तकृतो राजभयेषु च॥ १२५<br><br>अत्रान्योत्पातभूकम्पदावाग्निपांसुवृष्टिषु ।<br>उल्कापाते महावाते विना वृष्ट्यातिवृष्टिषु॥ १२६ | पिनाकधारी [शिव]-के इस शरभकी आकृतिवाले श्रेष्ठ रूपको स्थिर प्रज्ञावाले उत्सुक भक्तोंमें प्रकाशित करना चाहिये और उन्हीं शिवसमर्पित मनवाले भक्तोंके द्वारा शिवके सभी उत्सवोंमें और अष्टमी तथा चतुर्दशीके दिन इसका पाठ तथा श्रवण किया जाना चाहिये। शिव-प्रतिष्ठाके अवसरोंपर शिवकी सन्निधि प्राप्त करनेवाले इस स्तोत्रको पढ़ना चाहिये। अतः चोर-बाघ-सर्प-सिंह आदिसे भय होनेपर, राजासे भय उत्पन्न होनेपर, इस लोकमें अन्य उत्पात-भूकम्प-दावाग्नि, धूलवृष्टि (आँधी) |