श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ५१२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| अतस्तत्र पठेद्द्विज्ञाच्छिवभक्तो दृढव्रतः ।<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि स्तवं सर्वमनुत्तमम् ॥ १२७<br>स रुद्रत्वं समासाद्य रुद्रस्यानुचरो भवेत् ॥ १२८ | होनेपर, उल्कापात होनेपर, तेज हवा चलनेपर, अनावृष्टि तथा अतिवृष्टि होनेपर दृढ़ व्रतवाले विद्वान् शिवभक्तको इस [शरभचरित]-को पढ़ना चाहिये। जो इस सर्वोत्तम स्तोत्रको पढ़ता अथवा सुनता है, वह रुद्रत्व प्राप्त करके रुद्रका अनुचर हो जाता है॥ १२३—१२८ ॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे शरभप्रादुर्भावो नाम षण्णवतितमोऽध्यायः ॥ ९६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'शरभप्रादुर्भाव' नामक छानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९६ ॥
सत्तानबेवाँ अध्याय
जलन्धर-वधकी कथा
| ऋषय ऊचुः | ऋषिगण बोले— |
|---|---|
| जलन्धरं जटामौलिः पुरा जम्भारिविक्रमम् ।<br>कथं जघान भगवान् भग्ननेत्रहरो हरः ॥ १<br>वक्तुमर्हसि चास्माकं रोमहर्षण सुव्रत । | हे रोमहर्षण ! हे सुव्रत ! सिरपर जटाधारण करनेवाले तथा भगके नेत्रोंका हरण करनेवाले भगवान् शिवने इन्द्रके समान पराक्रमी जलन्धरका वध कैसे किया; हम लोगोंको यह बतानेकी कृपा कीजिये ॥ १ १/२ ॥ |
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
| जलन्धर इति ख्यातो जलमण्डलसम्भवः ॥ २<br>आसीद्दन्तकसङ्काशस्तपसा लब्धविक्रमः ।<br>तेन देवाः सगन्धर्वाः सयक्षोरगराक्षसाः ॥ ३<br>निर्जिताः समरे सर्वे ब्रह्मा च भगवानजः ।<br>जित्वाैव देवसङ्घातं ब्रह्माणं वै जलन्धरः ॥ ४ | [हे ऋषियो !] जलमण्डलसे उत्पन्न जलन्धर नामसे प्रसिद्ध यमराजतुल्य एक असुर था; वह अपनी तपस्यासे बड़ा पराक्रमी हो गया था। उसने युद्धमें गन्धर्व, यक्ष, उरग तथा राक्षसोंसहित सभी देवताओंको और अजन्मा भगवान् ब्रह्माको भी जीत लिया था ॥ २-३ १/२ ॥ |
| जगाम देवदेवेशं विष्णुं विश्वहरं गुरुम् ।<br>तयोः समभवद्युद्धं दिवारात्रमविश्रमम् ॥ ५<br>जलन्धरेशयोस्तेन निर्जितो मधुसूदनः ।<br>जलन्धरोऽपि तं जित्वा देवदेवं जनार्दनम् ॥ ६ | देवसमुदाय तथा ब्रह्माको जीत करके वह जलन्धर विश्वविनाशक देवदेवेश्वर गुरु विष्णुके यहाँ पहुँचा। उन दोनोंमें दिन-रात निरन्तर युद्ध होता रहा और उसने मधुसूदन (विष्णु)-को भी पराजित कर दिया ॥ ४-५ १/२ ॥ |
| प्रोवाचेदं दितेः पुत्रान् न्यायधीर्जेतुमीश्वरम् ।<br>सर्वे जिता मया युद्धे शङ्करो ह्यजितो रणे ॥ ७<br>तं जित्वा सर्वमीशानं गणपैर्नन्दिना क्षणात् ।<br>अहमेव भवत्वं च ब्रह्मत्वं वैष्णवं तथा ॥ ८<br>वासवत्वं च युष्माकं दास्ये दानवपुङ्गवाः ।<br>जलन्धरवचः श्रुत्वा सर्वे ते दानवाधमाः ॥ ९ | उन देवदेव जनार्दनको भी जीतकर न्यायबुद्धिवाले जलन्धरने ईश्वर (शिव)-को जीतनेके लिये दितिके पुत्रोंसे कहा—'मैंने युद्धमें सबको जीत लिया है, केवल शंकर ही अजित रह गये हैं। हे श्रेष्ठ दानवो! गणेश्वरों तथा नन्दीसहित उन सर्व ईशानको क्षणभरमें जीतकर मैं तुम लोगोंको शिव, ब्रह्मा, विष्णु तथा इन्द्रका पद प्रदान कर दूँगा' ॥ ६-८ १/२ ॥ |
| जगर्जुरुच्चैः पापिष्ठा मृत्युदर्शनतत्पराः ।<br>दैत्यैरैतैस्तथान्यैश्च रथनागतुरङ्गमैः ॥ १० | तब जलन्धरका वचन सुनकर वे सभी अधम, पापी तथा मृत्युके दर्शनमें तत्पर दानव उच्च स्वरमें |