भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 515
अध्याय ९७ ]जलन्धर-वधकी कथा५१३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सनद्धैः सह सन्नह्य शर्वं प्रति ययौ बली।<br>भवोऽपि दृष्ट्वा दैत्येन्द्रं मेरुकूटमिव स्थितम्॥ ११गरजने लगे। इसके बाद वह बलशाली जलन्धर रथ, हाथी तथा घोड़ोंपर सवार शस्त्रयुक्त इन दैत्यों तथा अन्य [सैनिकों]-के साथ सावधान होकर शिवजीकी ओर चल पड़ा॥ ९-१०१/२॥
अवध्यत्वमपि श्रुत्वा तथान्यैर्भगनेत्रहा।<br>ब्रह्मणो वचनं रक्षन् रक्षको जगतां प्रभुः॥ १२<br><br>साम्बः सनन्दी सगणः प्रोवाच प्रहसन्निव।<br>किं कृत्यमसुरेशान युद्धेनानेन साम्प्रतम्॥ १३तब मेरुके शिखरके समान स्थित उस दैत्यराजको देखकर तथा उसके अवध्यत्वको दूसरोंसे सुनकर भगके नेत्रका हरण करनेवाले तथा लोकोंकी रक्षा करनेवाले प्रभु शिवने, जो पार्वती, नन्दी तथा गणोंसहित वहाँ थे, ब्रह्माके वचनकी रक्षा करते हुए हँसते हुए [उस दैत्यसे] कहा—'हे असुरेश्वर! अब इस युद्धसे कौन-सा कार्य सिद्ध होगा? मेरे बाणोंके द्वारा छिन्न-भिन्न अंगोंवाला होकर प्रसन्नतापूर्वक मरनेके लिये तैयार हो जाओ'॥ ११–१३१/२॥
मद्बाणैर्भिन्नसर्वाङ्गो मर्तुमभ्युद्यतो मुदा।<br>जलन्धरोऽपि तद्वाक्यं श्रुत्वा श्रोत्रविदारणम्॥ १४<br><br>सुरेश्वरमुवाचेदं सुरेतरबलेश्वरः।<br>वाक्येनालं महाबाहो देवदेव वृषध्वज॥ १५कानोंको विदीर्ण करनेवाले उस वचनको सुनकर असुरसेनाके स्वामी जलन्धरने भी सुरेश्वर [शिव]-से यह [वचन] कहा—हे महाबाहो, हे देवदेव! हे वृषभध्वज! ऐसी बात मत बोलिये; हे हर! मैं चन्द्रकिरणोंके समान [चमकते हुए] शस्त्रोंसे युद्ध करनेके लिये यहाँ आया हूँ॥ १४-१५१/२॥
चन्द्रांशुसन्निभैः शस्त्रैर्हर योद्धुमिहागतः।<br>निशम्यास्य वचः शूली पादाङ्गुष्ठेन लीलया।<br>महाम्भसि चकाराशु रथाङ्गं रौद्रमायुधम्॥ १६उसके वचनको सुनकर शिवजीने शीघ्र ही लीलापूर्वक [अपने] पैरके अँगूठेसे महासागरमें भयानक चक्ररूपी आयुध निर्मित कर दिया॥ १६॥
कृत्वाणर्वाम्भसि सितं भगवान् रथाङ्गं<br>स्मृत्वा जगतत्रयमनेन हताः सुराश्च।<br>दक्षान्धकान्तकपुरत्रययज्ञहर्ता<br>लोकत्रयान्तककरः प्रहसंस्तदाह॥ १७<br><br>पादेन निर्मितं दैत्यजलन्धरमहार्णवे।<br>बलवान् यदि चोद्धर्तुं तिष्ठ योद्धुं न चान्यथा॥ १८तब समुद्रजलमें इस शुभ्र चक्रको स्थित करके और यह सोचकर कि 'इसके द्वारा तीनों लोक तथा देवतागण मार दिये जायेंगे' दक्ष, अन्धक, अन्तक और त्रिपुरके यज्ञको नष्ट करनेवाले तथा तीनों लोकोंका संहार करनेवाले भगवान् [शिव] हँसते हुए कहने लगे—हे दैत्य! हे जलन्धर! महासागरमें [मेरे] पादांगुष्ठसे निर्मित किये गये अस्त्रको उठानेमें यदि तुम समर्थ हो जाओ, तब तो युद्ध करनेके लिये ठहरो; अन्यथा नहीं॥ १७-१८॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा क्रोधेनादीप्तलोचनः।<br>प्रदहन्निव नेत्राभ्यां प्राहालोक्य जगत्त्रयम्॥ १९उनके उस वचनको सुनकर क्रोधसे प्रदीप्त नेत्रोंवाला वह [जलन्धर] तीनों लोकोंको [अपने] नेत्रोंसे दग्ध-सा करता हुआ शिवजीकी ओर देखकर कहने लगा॥ १९॥