श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| जलन्धर उवाच | **जलन्धर बोला—**हे शंकर! जिस प्रकार गरुड़ [विषहीन] डुंडुभ सर्पोंको मार डालता है, वैसे ही अपनी गदा उठाकर नन्दीको तथा तुमको मारकर पुनः देवताओंसहित सभी लोकोंका संहार करके मैं इन्द्रसहित सम्पूर्ण चराचर जगत्का संहार करनेमें समर्थ हूँ। हे महेश्वर! तीनों लोकोंमें ऐसा कौन है, जो मेरे बाणोंद्वारा छेदनके योग्य न हो! मैंने बचपनमें तपस्यासे भगवान् विष्णुको जीत लिया था और युवावस्थामें बलशाली ब्रह्माको तथा बड़े-बड़े देवताओंसहित मुनियोंको जीत लिया था॥ २०—२२॥ | | गदामुद्धृत्य हत्वा च नन्दिनं त्वां च शङ्कर।<br>हत्वा लोकान् सुरैः सार्धं डुण्डुभान् गरुडो यथा॥ २०<br>हन्तुं चराचरं सर्वं समर्थोऽहं सवासवम्।<br>को महेश्वर मद्बाणैरच्छेद्यो भुवनत्रये॥ २१<br>बालभावे च भगवान् तपसैव विनिर्जितः।<br>ब्रह्मा बली यौवने वै मुनयः सुरपुङ्गवैः॥ २२ | | | दग्धं क्षणेन सकलं त्रैलोक्यं सचराचरम्।<br>तपसा किं त्वया रुद्र निर्जितो भगवानपि॥ २३<br>इन्द्राग्नियमवित्तेशवायुवारीश्वरादयः।<br>न सेहिरे यथा नागा गन्धं पक्षिफ्तेरिव॥ २४<br>न लब्ध्वा दिवि भूमौ च बाहवो मम शङ्कर।<br>समस्तान् पर्वतान् प्राप्य घर्षिताश्च गणेश्वर॥ २५<br>गिरीन्द्रो मन्दरः श्रीमान्नीलो मेरुः सुशोभनः।<br>घर्षितो बाहुदण्डेन कण्डूनोदार्थमापतत्॥ २६ | मैंने चराचरसहित त्रिलोकीको क्षणभरमें दग्ध कर दिया था। हे रुद्र! क्या तुमने तपस्यासे भगवान् विष्णुको पराजित किया है? जैसे सर्प गरुड़की गन्धको सहन नहीं कर सकते, उसी प्रकार इन्द्र, अग्नि, यम, कुबेर, वायु, वरुण आदि भी मेरी गन्धको सहन नहीं कर सकते हैं। हे शंकर! स्वर्गमें तथा पृथ्वीपर अपना प्रतिद्वन्द्वी न पाकर सभी पर्वतोंपर जाकर मैंने अपनी भुजाओंको घर्षित किया था। हे गणेश्वर! खुजलाहट मिटानेके लिये मैंने अपने बाहुदण्डसे गिरिराज मन्दर, श्रीसम्पन्न नीलपर्वत और अति सुन्दर मेरु पर्वतको घर्षित किया था और वे गिर पड़े थे॥ २३—२६॥ | | गङ्गा निरुद्धा बाहुभ्यां लीलार्थं हिमवद्गिरौ।<br>नारीणां मम भृत्यैश्च वज्रो बद्धो दिवौकसाम्॥ २७<br>वडवाया मुखं भग्नं गृहीत्वा वै करेण तु।<br>तत्क्षणादेव सकलं चैकार्णवमभूदिदम्॥ २८<br>ऐरावतादयो नागाः क्षिप्ताः सिन्धुजलोपरि।<br>सरथो भगवानिन्द्रः क्षिप्तश्च शतयोजनम्॥ २९<br>गरुडोऽपि मया बद्धो नागपाशेन विष्णुना।<br>उर्वश्याद्या मया नीता नार्यः कारागृहान्तरम्॥ ३०<br>कथञ्चिल्लब्धवान् शक्रः शचीमेकां प्रणम्य माम्।<br>मां न जानासि दैत्येन्द्रं जलन्धरमुमापते॥ ३१ | हिमालय पर्वतपर लीलावश मेरी भुजाओंके द्वारा गंगा रोक ली गयी थी और मेरी स्त्रियोंके सेवकोंद्वारा देवताओंका वज्र बाँध लिया गया था। मैंने हाथसे पकड़कर बड़वाग्निके मुखको भंग कर दिया था; उसी क्षण यह सब एकार्णव हो गया था। मैंने ऐरावत आदि हाथियोंको समुद्रजलके ऊपर फेंक दिया था और भगवान् इन्द्रको रथसहित सौ योजन दूर फेंक दिया था। मैंने विष्णुसहित गरुड़को भी नागपाशसे बाँध लिया था। मैंने उर्वशी आदि नारियोंको कारागृहके अन्दर डाल दिया था और इन्द्रने मुझको प्रणाम करके किसी प्रकार केवल शचीको वापस प्राप्त किया था। हे उमापते! [क्या] आप मुझ दैत्यराज जलन्धरको नहीं जानते हैं?॥ २७—३१॥ | | सूत उवाच<br>एवमुक्तो महादेवः प्रादहद्वै रथं तदा।<br>तस्य नेत्राग्निभागैककलार्धार्धेन चाकुलम्॥ ३२ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] तब उसके इस प्रकार कहनेपर महादेवने अपने नेत्रकी अग्निके एक |