श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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अध्याय ९७ ] जलन्धर-वधकी कथा ५१५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| भागकी कलाके आधेके भी आधे भागसे उसके समूचे रथको जला दिया॥ ३२॥ | |
| दैत्यानामतुलबलैर्हयैश्च नागै-<br>दैत्येन्द्रास्त्रिपुररिपोर्निरीक्षणेन ।<br>नागाद्रैशसमनुसंवृतश्च नागै-<br>दैवेशं वचनमुवाच चाल्पबुद्धिः॥ ३३<br><br>किं कार्यं मम युधि देवदैत्य-<br>सङ्घैर्हन्तुं यत्सकलमिदं क्षणात्समर्थः।<br>यत्तस्माद्भयमिह नास्ति योद्धु-<br>मीश वाञ्छैषा विपुलतरा न संशयोऽत्र॥ ३४<br><br>तस्मात्त्वं मम मदनारिदक्षशत्रो<br>यज्ञारे त्रिपुररिपो ममैव वीरैः।<br>भूतैर्नन्दैर्हरिवदनेन देवसङ्घैर्योद्धुं<br>ते बलमिह चास्ति चेद्धि तिष्ठ॥ ३५ | त्रिपुरशत्रु शिवके देखनेमात्रसे दैत्योंकी विशाल सेनाओं, घोड़ों तथा हाथियोंके साथ सभी दैत्येन्द्र दग्ध हो गये। गजोंसे चारों ओरसे घिरा हुआ वह अल्पबुद्धि जलन्धर हाथीसे उतरकर विनाशके लिये उद्यत देवेश [शिव]-से बोला—मुझे युद्ध करनेसे क्या प्रयोजन; क्योंकि मैं देवदैत्य-सहित इस समस्त जगत्को क्षणभरमें नष्ट करनेमें समर्थ हूँ। अतः हे ईश! मुझे कोई भय नहीं है, किंतु आपसे युद्ध करनेकी मेरी तीव्र इच्छा है; इसमें सन्देह नहीं है। अतएव हे मदनारि! हे दक्षशत्रु! हे यज्ञशत्रु! हे त्रिपुरशत्रु! यदि भूतगणों, नन्दी, देवसमुदायसहित मेरे वीरोंके साथ युद्ध करनेका तुम्हारा सामर्थ्य है, तो यहाँ ठहरो॥ ३३—३५॥ |
| इत्युक्त्वाथ महादेवं महादेवारिनन्दनः।<br>न चचाल न सस्मार निहतान् बान्धवान् युधि॥ ३६<br><br>दुर्मदेनाविनीतात्मा दोर्भ्यामास्फोट्य दोर्बलात्।<br>सुदर्शनाख्यं यच्चक्रं तेन हन्तुं समुद्यतः॥ ३७<br><br>दुर्धरेण रथाङ्गेन कृच्छ्रेणापि द्विजोत्तमाः।<br>स्थापयामास वै स्कन्धे द्विधाभूतश्च तेन वै॥ ३८<br><br>कुलिशेन यथा छिन्नो द्विधा गिरिवरो द्विजाः।<br>पपात दैत्यो बलवानञ्जनाद्रिरिवापरः॥ ३९ | महादेवसे ऐसा कहकर महादेवके शत्रुओंको आनन्दित करनेवाला वह [जलन्धर] न तो हिला-डुला और न तो उसने युद्धमें मारे गये बान्धवोंका स्मरण किया। अभिमानके कारण उद्दण्ड स्वभाववाला जलन्धर भुजाओंसे शब्द करके [शिवको] मारनेके लिये उद्यत हुआ और उसने [रुद्रनिर्मित] जो सुदर्शन नामक चक्र था, उसे अपने भुजाबलसे बड़े प्रयासके द्वारा अपने कन्धेपर रखा; हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! उसी समय उस दुर्धर (भयानक) चक्रसे उस जलन्धरके दो टुकड़े उसी प्रकार हो गये, जैसे वज्रके द्वारा काटा गया कोई महापर्वत दो भागोंमें हो जाता है। हे द्विजो! वह बलवान् दैत्य दूसरे अंजन पर्वतकी भाँति गिर पड़ा॥ ३६—३९॥ |
| तस्य रक्तेन रौद्रेण सम्पूर्णमभवत्क्षणात्।<br>तद्रक्तमखिलं रुद्रनियोगान्मांसमेव च॥ ४०<br><br>महारौरवमासाद्य रक्तकुण्डमभूदहो।<br>जलन्धरं हतं दृष्ट्वा देवगन्धर्वपार्षदाः॥ ४१<br><br>सिंहनादं महत्कृत्वा साधु देवेति चाब्रुवन्।<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि जलन्धरविमर्दनम्॥ ४२<br><br>श्रावयेद्वा यथान्यायं गाणपत्यमवाप्नुयात्॥ ४३ | उसके भयानक रक्तसे उसी क्षण वह स्थान भर गया; अहो, रुद्रकी आज्ञासे उसका सारा रक्त तथा मांस महारौरव नरकमें पहुँचकर रक्तकुण्ड बन गया। उस समय जलन्धरको मरा हुआ देखकर देवता, गन्धर्व तथा पार्षद महान् सिंहनाद करके 'हे देव! बहुत अच्छा हुआ'—ऐसा कहने लगे। जो [व्यक्ति] जलन्धर-वधकी इस कथाको विधिपूर्वक पढ़ता है अथवा सुनता है अथवा सुनाता है, वह गणपतिपद प्राप्त करता है॥ ४०—४३॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे जलन्धरवधो नाम सप्तनवतितमोऽध्यायः॥ ९७॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'जलन्धर-वध' नामक सत्तानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९७॥