भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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५१६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

अठानबेवाँ अध्याय

भगवान् विष्णुद्वारा एक सहस्र नामोंसे भगवान् शिवकी स्तुति करना तथा प्रसन्न होकर महेश्वरद्वारा उन्हें सुदर्शनचक्र प्रदान करना

ऋषय ऊचुःऋषिगण बोले— हे सूतजी! भगवान् विष्णुने देवदेव महेश्वरसे सुदर्शन नामक चक्र कैसे प्राप्त किया; इसे आप बतानेकी कृपा करें॥ १॥
कथं देवेन वै सूत देवदेवान्महेश्वरात्।<br>सुदर्शनाख्यं वै लब्धं वक्तुमर्हसि विष्णुना ॥ १
सूत उवाचसूतजी बोले— [हे ऋषियो!] देवताओं तथा महान् असुरोंके बीच सभी प्राणियोंके लिये विनाशकारी अति भयंकर तथा महान् युद्ध हुआ। शक्ति, मुसलों, झुके पर्वोंवाले बाणों तथा भालोंसे प्रहार किये जानेपर वे देवतागण भयसे व्याकुल होकर भाग गये॥ २-३॥
देवानामसुरेन्द्राणामभवच्च सुदारुणः।<br>सर्वेषामेव भूतानां विनाशकरणो महान् ॥ २
ते देवाः शक्तिमुशलैः सायकैर्नतपर्वभिः।<br>प्रभिद्यमानाः कुन्तैश्च दुद्रुवुर्भयविह्वलाः ॥ ३
पराजितास्तदा देवा देवदेवेश्वरं हरिम्।<br>प्रणेमुस्तं सुरेशानं शोकसंविग्नमानसाः ॥ ४तदनन्तर पराजित होकर शोकसंतप्त मनवाले देवताओंने देवदेवेश्वर सुरेशान विष्णुके पास जाकर उन्हें प्रणाम किया॥ ४॥
तान् समीक्ष्याथ भगवान् देवदेवेश्वरो हरिः।<br>प्रणिपत्य स्थितान् देवानिदं वचनमब्रवीत् ॥ ५प्रणाम करके स्थित हुए उन देवताओंकी ओर देखकर देवदेवेश्वर भगवान् विष्णुने यह वचन कहा—
वत्साः किमिति वै देवाश्च्युतालङ्कारविक्रमाः।<br>समागताः ससन्तापाः वक्तुमर्हथ सुव्रताः ॥ ६हे वत्स देवतागण! हे सुव्रतो! अलंकार तथा पराक्रमसे विहीन आप लोग दुःखी होकर यहाँपर किसलिये आये हैं; इसे बताइये॥ ५-६॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा तथाभूताः सुरोत्तमाः।<br>प्रणम्याहुर्यथावृत्तं देवदेवाय विष्णवे ॥ ७उनके उस वचनको सुनकर वैसी दशाको प्राप्त श्रेष्ठ देवतागण प्रणाम करके जैसा घटित हुआ था, वह सब उन देवदेव विष्णुसे कहने लगे॥ ७॥
भगवन् देवदेवेश विष्णो जिष्णो जनार्दन।<br>दानवैः पीडिताः सर्वे वयं शरणमागताः ॥ ८हे भगवन्! हे देवदेवेश! हे विष्णो! हे जिष्णो! हे जनार्दन! दानवोंसे पीड़ित होकर हम सभी आपकी शरणमें आये हैं। हे देवदेवेश! हे पुरुषोत्तम! आप ही हमलोगोंकी गति हैं, आप ही परमात्मा हैं और आप ही सभी लोकोंके पिता भी हैं। हे जनार्दन! आप ही भर्ता (भरण करनेवाले), हर्ता (संहार करनेवाले), भोक्ता तथा दाता हैं; अतः हे दैत्यमर्दन! आप दानवोंका वध करनेकी कृपा कीजिये॥ ८—१०॥
त्वमेव देवदेवेश गतिर्नः पुरुषोत्तम।<br>त्वमेव परमात्मा हि त्वं पिता जगतामपि ॥ ९
त्वमेव भर्ता हर्ता च भोक्ता दाता जनार्दन।<br>हन्तुमर्हसि तस्मात्त्वं दानवान् दानवार्दन ॥ १०
दैत्याश्च वैष्णवैर्ब्राह्मै रौद्रैर्याम्यैः सुदारुणैः।<br>कौबेरैश्चैव सौम्यैश्च नैर्ऋत्यैर्वारुणैर्दृढैः ॥ ११हे कमलनयन! वे सभी दैत्य वर प्राप्त कर लेनेके कारण विष्णु, ब्रह्मा, रुद्र, यम, कुबेर, चन्द्र, निर्ऋति, वरुण, वायु, अग्नि, ईशान, पर्जन्य तथा सूर्यके अत्यन्त दृढ़-दारुण-भयानक-कँपा देनेवाले तथा शक्तिरहित कर
वायव्यैश्च तथाग्नेयैरैशान्यैर्वाषिँकैः शुभैः।<br>सौरै रौद्रैस्तथा भीमैः कम्प्यैर्जृम्भणैर्दृढैः ॥ १२
अवध्या वरलाभात्ते सर्वे वारिजलोचन।<br>सूर्यमण्डलसम्भूतं त्वदीयं चक्रमुद्यतम् ॥ १३